(हाइकोर्ट):बिलासपुर ‘घरौंदा’ केंद्रों की पोल खुली, न डॉक्टर, न इलाज; कैदी को नग्न कर बिस्तर से बांधने का मामला आया सामने

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित ‘घरौंदा’ (आश्रय केंद्रों) में निरीक्षण के दौरान जो खुलासे हुए हैं, वे झकझोर देने वाले हैं। हाईकोर्ट के आयुक्तों द्वारा की गई जांच में इन केंद्रों की व्यवस्थाओं की पोल खुल गई है। यहां न तो मरीजों की सुध लेने वाले डॉक्टर समय पर आते हैं और न ही बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक कैदी को नग्न अवस्था में बिस्तर से बांधकर रखा गया था।
आइए जानते हैं इस पूरी रिपोर्ट की बड़ी बातें और हाईकोर्ट के सख्त रुख के बारे में।
1. डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की भारी लापरवाही
सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, योग्य डॉक्टरों का हफ्ते में दो बार आना और नर्सों या पैरामेडिकल स्टाफ का 24 घंटे मौजूद रहना अनिवार्य है। लेकिन:
- दिखावे का डॉक्टर दौरा: रजिस्टरों की जांच में सामने आया कि पिछले तीन महीनों में डॉक्टर महीने में सिर्फ एक या दो बार ही आए।
- 24 घंटे स्टाफ नदारद: चौबीसों घंटे नर्सिंग सहायता या नियमित मानसिक स्वास्थ्य (मनोरोग) जांच का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
- अधूरे दस्तावेज: कुमारी बाई, शोभा और मीना जैसे मामलों में मरीजों के लक्षण, बीमारी का पता चलने की तारीख और अस्पताल ले जाने से पहले दी गई मेडिकल हेल्प का कोई सही रिकॉर्ड दर्ज नहीं था।
2. अमानवीयता की हदें: कैदी को बिस्तर से बांधा
निरीक्षण के दौरान एक बेहद चौंकाने वाली घटना सामने आई:
- एक कैदी को उसके बिस्तर के चारों कोनों से नग्न अवस्था में बांधकर रखा गया था।
- कर्मचारियों ने उसे “अति उत्साही” (Hyperactive) बताकर अपना बचाव किया।
- आयुक्त के दखल के बाद उसे करीब आधे घंटे बाद बंधनमुक्त किया गया, जिसके बाद वह तुरंत शौचालय गया।
- हैरानी की बात यह है कि उसे शारीरिक रूप से बांधने की अनुमति देने वाला कोई भी चिकित्सीय परामर्श या डॉक्टर का पर्चा नहीं मिला।
3. घटिया खाना, अस्वच्छता और बिगड़ी हुई सेहत
- खराब खान-पान: केंद्रों में कैदियों को जो खाना परोसा जा रहा था, वह बेहद घटिया क्वालिटी और अपर्याप्त मात्रा में था।
- शौचालय की बदहाली: टॉयलेट्स में साफ-सफाई का बिल्कुल ख्याल नहीं रखा जा रहा था।
- दवाइयों का ओवरडोज: उचित और पौष्टिक भोजन न मिलने के बावजूद कैदियों को भारी मात्रा में मनोरोग संबंधी दवाएं दी जा रही थीं।
- नाममात्र के रिकॉर्ड: व्यक्तिगत स्वास्थ्य रिकॉर्ड रखने के बजाय केवल सामान्य एंट्रीज (जैसे 14 अगस्त और 12 सितंबर) दर्ज मिलीं।
4. हाईकोर्ट का सख्त रुख और निर्देश
रायपुर के कोपल वाणी बाल कल्याण संगठन द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने कड़े कदम उठाए हैं:
- राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
- अदालत ने यह जांचने को भी कहा है कि क्या आयुक्तों को घरौंडा केंद्रों के CCTV कैमरों की लाइव या रिकॉर्डेड एक्सेस दी जा सकती है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
- संबंधित जिलों के नोडल अधिकारियों और प्रभारियों को निर्देश दिया गया है कि वे आयुक्तों के साथ मासिक रिपोर्ट साझा करें ताकि 5 मार्च 2019 के दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन हो सके।
यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि मानसिक और आश्रय गृहों में रह रहे कमजोर वर्ग के लोगों की सुरक्षा पर भी बड़ा सवालिया निशान लगाता है।




