उच्च न्यायालयकोंडागांव

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट : 374 किलो गांजा जब्ती के मामले में आरोपी बरी, पुलिस और जांच एजेंसियों की घोर लापरवाही उजागर

(कोंडागांव)

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण और बड़े मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह पलट दिया है। अदालत ने सैंपलिंग, सुरक्षित सीलिंग और फोरेंसिक लैब में सैंपल भेजने की प्रक्रिया में गंभीर कमियों (Chain of Custody की खामियों) को आधार बनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया है।

मामला और पृष्ठभूमि

यह मामला कोंडागांव जिले से जुड़ा है, जहां 374 किलोग्राम से अधिक गांजा जब्ती का मामला सामने आया था। निचली अदालत (कोंडागांव स्थित एनडीपीएस के विशेष न्यायाधीश) ने 26 दिसंबर, 2020 को पारित अपने फैसले में आरोपी मोहम्मद अब्दुल शकूर को दोषी ठहराते हुए एनडीपीएस अधिनियम की धारा 20(बी)(ii)(सी) के तहत सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील संख्या 193/2021 दायर की गई थी। इस मामले में अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुश्री किरण जैन और श्री राजेश जैन ने पैरवी की, जबकि राज्य की ओर से पैनल वकील श्री खुलेश साहू उपस्थित रहे।

हाईकोर्ट ने क्यों दी राहत? (जांच एजेंसियों की खामियां)

अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया कि एनडीपीएस मामलों में जांच एजेंसियों की पारदर्शिता और सतर्कता बेहद जरूरी है। कोर्ट के अनुसार, प्रारंभिक ज़ब्ती से लेकर मालखाना भंडारण, सूचीकरण, नमूनाकरण, सुरक्षित सीलिंग और फोरेंसिक प्रयोगशाला (FSL) में नमूनों के हस्तांतरण तक के हर चरण में रिकॉर्ड की निरंतरता (Continuity) बनी होनी चाहिए।

इस मामले में अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष और जांच एजेंसियों की हिरासत श्रृंखला (Chain of Custody) में स्पष्ट और वास्तविक कमियां थीं। प्रलेखित नमूना आवागमन और फोरेंसिक प्रेषण में उचित साक्ष्यों और निरंतरता का अभाव था, जिसके चलते अदालत ने उचित संदेह का लाभ आरोपी को दिया।

अदालत का अंतिम आदेश और निर्देश

  • दोषसिद्धि और सजा रद्द: हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के 26 दिसंबर 2020 के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया।
  • तत्काल रिहाई: न्यायालय ने मोहम्मद अब्दुल शकूर को आरोपों से बरी करते हुए निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल जेल से रिहा किया जाए।
  • जुर्माना और बॉन्ड: यदि अपीलकर्ता द्वारा कोई जुर्माना राशि पहले ही जमा कर दी गई है, तो उसे वापस किया जाए। साथ ही, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 481 के तहत अपीलकर्ता के जमानत बांड अगले छह महीने तक प्रभावी रहने का निर्देश दिया गया है।
  • रिकॉर्ड वापसी: मामले के अनुपालन के लिए निचली अदालत के रिकॉर्ड को वापस भेजने का आदेश दिया गया है।
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