न्यायधानी

जेल की चारदीवारी और कर्मों का सिद्धांत: वर्तमान के श्रेष्ठ कर्मों से ही तय होता है भविष्य – संतोषी दीदी

बिलासपुर: “ब्रह्मांड का यह नियम अटल है—’जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’। हम जो भी विचार, बोल या कर्म इस सृष्टि में भेजते हैं, वह कई गुना होकर हमारे पास ही लौटकर आता है।” इन प्रेरणादायक और जीवन बदलने वाले शब्दों के साथ प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरी विश्व विद्यालय, बिलासपुर की वरिष्ठ राजयोग शिक्षिका संतोषी दीदी ने बिलासपुर केंद्रीय जेल के बंदियों को अध्यात्म और कर्म के गहरे सिद्धांतों से रूबरू कराया।

राजयोग भवन की मुख्य शाखा की ओर से आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में दीदी ने बंदियों को सकारात्मक जीवन जीने और अपने भविष्य को नया आकार देने का मार्ग दिखाया। आइए जानते हैं इस प्रेरणादायक आयोजन की मुख्य बातें:

1. वर्तमान के श्रेष्ठ कर्मों से संवर सकता है भविष्य

संतोषी दीदी ने स्पष्ट किया कि जेल की चारदीवारी के भीतर रहने वालों के लिए वर्तमान परिस्थितियां भले ही उनके अतीत के किन्हीं गलत कर्मों का परिणाम हों, लेकिन उनका आने वाला कल पूरी तरह से उनके आज के यानी वर्तमान के श्रेष्ठ कर्मों पर निर्भर करता है। यह समय निराशा में डूबने का नहीं, बल्कि आत्म-मंथन कर एक बेहतर इंसान बनने का है।

2. ‘पर-निंदा’ है सबसे सूक्ष्म पाप, बचने की है जरूरत

दीदी ने दूसरों की बुराई यानी ‘पर-निंदा’ को सबसे सूक्ष्म पाप बताते हुए इसके कार्मिक नुकसान के बारे में बताया:

  • कर्मों का फेर: जब हम किसी की पीठ पीछे बुराई करते हैं, तो हम अनजाने में उस व्यक्ति के पापों का बोझ अपने सिर पर खींच रहे होते हैं। निंदा करने वाले के खाते में वे पाप जुड़ जाते हैं।
  • श्रोता भी बनते हैं भागीदार: जो लोग मूक दर्शक या श्रोता बनकर किसी की बुराई रस लेकर सुनते हैं, वे भी उस नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेते हैं और उस पाप के बराबर के हिस्सेदार बन जाते हैं।
  • समाधान: यदि कोई आपके सामने किसी तीसरे की बुराई शुरू करे, तो उसे तुरंत रोक दें या वहां से हट जाएं। किसी के अवगुणों को सुनना अपने मन में कचरा इकट्ठा करने जैसा है।

3. दुआओं का अलौकिक कवच: मुश्किलों की हर एक राह आसान

दीदी ने बंदियों को प्रेरित करते हुए बताया कि दुआएं कमाना जीवन की सबसे बड़ी और सच्ची संपत्ति है।

  • जब हम विपरीत परिस्थितियों में भी दूसरों के प्रति शुभ भावना रखते हैं और उन्हें दिल से दुआएं देते हैं, तो ब्रह्मांड के नियम के तहत वे दुआएं सुरक्षा कवच बनकर हमारे पास लौटती हैं।
  • गंभीर संकट या कर्मों के कड़े बंधन में फंसी आत्मा के लिए किसी की सच्ची दुआ ही सबसे बड़ा सहारा बनती है। यह जीवन की बड़ी से बड़ी मुश्किलों को रूई के फाहे की तरह हल्का कर देती है।

4. जेल सुधार की तपोभूमि: अपने भीतर के ‘रावण’ का करें दहन

दशहरे के आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि वास्तविक रावण बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपा है। अपने अंदर के क्रोध, मोह, लोभ और अपराध बोध जैसे अवगुणों रूपी रावण को हमेशा के लिए खत्म करने का संकल्प लें। जेल कोई सजा की जगह नहीं, बल्कि एक तपोभूमि है, जहाँ खुद को तराशकर एक नया और श्रेष्ठ इंसान बनाया जा सकता है।

5. मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का मेल

कार्यक्रम के अगले चरण में भ्राता डॉ. केके तिवारी ने बंदियों को संबोधित करते हुए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के अंतर्संबंध को समझाया।

  • उन्होंने कहा कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है।
  • बंदियों को जेल परिसर में उपलब्ध संसाधनों के बीच अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करने, नियमित योग-प्राणायाम करने और तनाव से दूर रहने के व्यावहारिक तरीके बताए गए।
  • मानसिक तनाव और अवसाद को दूर करने के लिए उन्होंने सकारात्मक सोच और मेडिटेशन (राजयोग) को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाने पर विशेष बल दिया।
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