
छत्तीसगढ़ के गलियारों में इन दिनों एक नई चर्चा जोरों पर है—”रिटायरमेंट के बाद भी पद का मोह”। नवा रायपुर स्थित मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय (PHQ) के गलियारों से छनकर आ रही खबरें बताती हैं कि खाकी और खादी के बीच ‘जुगलबंदी’ का एक नया अध्याय शुरू होने वाला है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, हाल ही में सेवानिवृत्त हुए कुछ वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने दोबारा सेवा में आने के लिए संविदा नियुक्ति का दांव खेला है।
सत्ता का ‘अधिकारी मोह’ या प्रशासनिक मजबूरी?
यह कोई पहली बार नहीं है जब छत्तीसगढ़ में सेवामुक्त अधिकारियों के लिए लाल कालीन बिछाई जा रही हो। इससे पहले भी कई वरिष्ठ अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद महत्वपूर्ण पदों पर संविदा नियुक्ति देकर नवाजा जा चुका है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रदेश में काबिल अधिकारियों का अकाल पड़ गया है, या फिर इन नियुक्तियों के पीछे कोई गहरा ‘प्रशासनिक रहस्य’ छिपा है?
बुद्धिजीवियों और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि आखिर नियत कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों की झोली में संविदा नियुक्तियां क्यों डाली जा रही हैं।
निचले कैडर में सुलगता असंतोष: “हमारा हक कौन मार रहा है?”
संविदा नियुक्तियों का सबसे नकारात्मक असर पुलिस और प्रशासनिक सेवा के उन अधिकारियों पर पड़ता है जो पदोन्नति की कतार में खड़े हैं। जानकारों का मानना है कि:
- पदोन्नति में बाधा: जब एक रिटायर्ड अधिकारी पद पर बना रहता है, तो उसके नीचे कार्य कर रहे अधिकारियों के प्रमोशन के रास्ते बंद हो जाते हैं।
- नई ऊर्जा का अभाव: सरकार 5 साल के लिए आती है, लेकिन अधिकारी 30-35 साल तक सिस्टम का हिस्सा रहते हैं। ऐसे में नए खून और नई सोच को मौका न मिलना ‘निचली पीढ़ी’ के साथ अन्याय माना जा रहा है।
21 जनवरी की कैबिनेट बैठक और बड़े फेरबदल के संकेत
सूत्रों की मानें तो 21 जनवरी को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में होने वाली कैबिनेट बैठक में कई बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। इस बैठक के केंद्र में न केवल संविदा नियुक्तियां होंगी, बल्कि प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में एक ‘बड़ा भूकंप’ आने की भी संभावना है। - कलेक्टर-एसपी की नई सूची: कई जिलों के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षकों के प्रभार बदले जा सकते हैं।
- रायपुर पुलिस कमिश्नरी: चर्चा है कि 23 जनवरी 2026 से राजधानी रायपुर में ‘पुलिस कमिश्नरी प्रणाली’ लागू करने के प्रारूप को अंतिम रूप दिया जा सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि राजधानी का पहला पुलिस कमिश्नर कौन बनेगा? क्या यहाँ भी किसी ‘खास’ की ताजपोशी होगी?
छत्तीसगढ़: क्या वाकई ‘कुबेर का खजाना’ है?
अंत में एक बड़ा नैतिक सवाल खड़ा होता है—आखिर क्यों सेवानिवृत्त अधिकारी शांत और शालीन छत्तीसगढ़ को छोड़ने को तैयार नहीं हैं? क्या यह व्यवस्था के प्रति समर्पण है या फिर ‘सत्ता के सुख’ का मोह? सरकार को इस पर एक स्पष्ट और पारदर्शी नीति बनाने की आवश्यकता है, ताकि प्रशासन की शुचिता और युवाओं का भविष्य सुरक्षित रह सके।


