पुलिस की वर्दी पहनना सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि बदलते दौर का गवाह बनना है। हाल ही में पुलिस विभाग में आयोजित एक विदाई समारोह ने इस बात को जीवंत कर दिया। अवसर था वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शंभू नाथ जी की सेवानिवृत्ति का। 1982 में खाकी का दामन थामने वाले शंभू नाथ जी जब 2026 में सेवामुक्त हुए, तो उनके पीछे साढ़े चार दशकों का एक लंबा और गौरवशाली अनुभव खड़ा था।
टेक्नोलॉजी का बदलता दौर और पुलिसिंग
समारोह के दौरान मंच से बोलते हुए वरिष्ठ अधिकारी श्री शुक्ला जी ने शंभू नाथ जी के कार्यकाल को ‘बदलाव का जीवंत दस्तावेज’ बताया। उन्होंने बड़े ही दिलचस्प अंदाज में समझाया कि कैसे 1982 से अब तक पुलिसिंग की दुनिया पूरी तरह बदल गई है।
एक दौर था जब पुलिस स्टेशनों में ‘डायल’ करने वाले फोन भी गिने-चुने होते थे। वहां से शुरू हुआ सफर बटन वाले फोन, पेजर और नोकिया के उन मजबूत हैंडसेट्स से होते हुए आज के आधुनिक स्मार्टफोन और हाई-टेक सर्विलांस तक पहुंच गया है। वक्ता ने रेखांकित किया कि शंभू नाथ जी ने न केवल इन बदलावों को देखा, बल्कि हर नई तकनीक के साथ खुद को ढाला और अपनी सेवा को प्रभावी बनाए रखा।
संतुष्टि: जीवन की सबसे बड़ी पूंजी
विदाई के इस भावुक क्षण में सबसे महत्वपूर्ण बात ‘जीवन की संतुष्टि’ पर कही गई। अधिकारी ने रेणुका चोपड़ा जी का जिक्र करते हुए कहा कि शंभू नाथ जी की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी ‘संतुष्टि’ है।
भाषण के दौरान एक गहरा संदेश दिया गया कि इंसान अपनी पूरी भागदौड़ और मेहनत के बाद अंत में जो हासिल करना चाहता है, वह है ‘संतुष्टि’। यदि मन में शांति और कार्य के प्रति संतोष है, तभी 40-44 साल की लंबी सेवा सार्थक मानी जा सकती है। भौतिक सुख-सुविधाओं के बीच शंभू नाथ जी का मुस्कुराता चेहरा इस बात का प्रमाण था कि उन्होंने अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से निभाया है।
सम्मान और स्मृतियों से भरा हॉल
कॉन्फ्रेंस हॉल का वातावरण खाकी के गौरव और अपनों के प्यार से सराबोर था। एक तरफ वर्दी में बैठे साथी अधिकारी थे, तो दूसरी तरफ शंभू नाथ जी का परिवार, जिनकी आंखों में गर्व और खुशी के मिले-जुले भाव थे। वहां मौजूद नागरिक और विभागीय कर्मी इस बात के गवाह बने कि एक पुलिसकर्मी का व्यक्तित्व समाज में कितनी गहरी छाप छोड़ता है।
हल्के नाश्ते और जलपान के बीच यादों का सिलसिला चलता रहा। यह सिर्फ एक विदाई नहीं थी, बल्कि एक युग का सम्मान था जिसने पुलिस विभाग को अपनी जिंदगी के सर्वश्रेष्ठ चार दशक दिए।



