
जिसे छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जीवनदायिनी माना जाता है, आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। हाल ही में ‘महानदी बचाओ आंदोलन’ (MBA) के कार्यकर्ताओं ने कलमा बैराज पर जो विरोध प्रदर्शन किया, उसने एक बार फिर नदी जल विवाद और पर्यावरणीय संकट को सुर्खियों में ला दिया है।
कलमा बैराज: विवाद का नया केंद्र
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में स्थित कलमा बैराज इन दिनों विरोध की आग में जल रहा है। आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि बैराज के पास ‘अवैध बालू बांध’ (Sand Dams) बनाकर नदी के स्वाभाविक प्रवाह को पूरी तरह ठप कर दिया गया है।
बैनर पर लिखे शब्द—”नदी जोड़ती है, तोड़ती नहीं”—साफ संकेत दे रहे हैं कि स्थानीय लोग अब नदी के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।
आंदोलन की मुख्य मांगें और चिंताएं
आंदोलन के संयोजक सुदर्शन दास और जल संरक्षणवादियों का मानना है कि यदि यही स्थिति रही, तो हीराकुंड बांध तक पहुंचने वाला पानी एक सपना बनकर रह जाएगा।

- औद्योगिक प्यास बनाम जनता का हक: आरोप है कि नदी के पानी को आम जनता और किसानों से छीनकर निजी उद्योगों की ओर मोड़ा जा रहा है।
- अवैध संरचनाओं का जाल: कलमा बैराज के नीचे रेत के अस्थायी बांध बनाकर पानी रोका जा रहा है, जो नदी के ‘राइट टू फ्लो’ (प्रवाह का अधिकार) का उल्लंघन है।
- पारिस्थितिक तंत्र पर खतरा: पानी रुकने से जलीय जीवों और नदी के किनारे रहने वाले समुदायों की आजीविका पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
दो राज्यों के बीच उलझा ‘महानदी’ का भविष्य
यह सिर्फ एक स्थानीय विरोध नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच वर्षों से चल रहे जल विवाद का हिस्सा है। जहाँ छत्तीसगढ़ अपनी विकास परियोजनाओं के लिए पानी रोकना चाहता है, वहीं ओडिशा का दावा है कि महानदी के ऊपरी हिस्से में बन रहे ये बैराज निचले इलाकों को रेगिस्तान बना देंगे।
अब आगे क्या?
महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (Tribunal) में मामला लंबित है, लेकिन धरातल पर स्थिति गंभीर है। क्या प्रशासन इन अवैध बालू बांधों को हटाएगा? या फिर विकास की अंधी दौड़ में हम अपनी सबसे बड़ी नदी को खो देंगे?
‘महानदी बचाओ आंदोलन’ ने यह साफ कर दिया है कि जब तक नदी का प्राकृतिक प्रवाह बहाल नहीं होता, यह संघर्ष जारी रहेगा।




