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बिलासपुर: अपोलो अस्पताल में नवजात की मौत पर ‘डिजिटल विद्रोह’ मी टू मूवमेंट के तौर पर

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी में एक बार फिर चिकित्सा जगत और आम जनता के बीच विश्वास की दीवार दरकती नजर आ रही है। अपोलो अस्पताल में एक नवजात की मृत्यु के बाद उपजा विवाद अब केवल अस्पताल की दीवारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सोशल मीडिया पर एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। डॉ. रश्मि शर्मा के खिलाफ “Metoo Movement” के नाम से एकजुट हुए परिजनों और नागरिकों ने अब सड़क पर उतरने का ऐलान कर दिया है।

क्या है विवाद की जड़?                                         विनोबा नगर निवासी पीहू अग्रवाल को प्रसव के लिए अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि वे 23 दिसंबर 2025 को सुबह से ही ऑपरेशन की गुहार लगाते रहे, लेकिन डॉ. रश्मि शर्मा ने उनकी बात अनसुनी कर दी। परिजनों के अनुसार, अस्पताल के एक अन्य चिकित्सक डॉ. दीपक अग्रवाल ने भी ऑपरेशन की सलाह दी थी, फिर भी देरी की गई जिसका परिणाम नवजात की मृत्यु के रूप में सामने आया।

विवादित पक्ष: आरोप और प्रत्यारोप ,परिजनों के गंभीर सवाल:

  • सोनोग्राफी में विरोधाभास: परिजनों का दावा है कि सुबह की रिपोर्ट में बच्चे के गले में 3 बार नाल फंसी थी, जबकि रात की रिपोर्ट में केवल 1 बार का जिक्र किया गया।
  • लापरवाही या हत्या: पीड़ित परिवार ने इसे सीधे तौर पर ‘हत्या’ करार देते हुए डॉक्टर का मेडिकल लाइसेंस निरस्त करने की मांग की है।
  • प्रबंधन पर आरोप: परिजनों का आरोप है कि घटना के बाद उन्हें 4 घंटे तक कमरे में बंद रखकर बरगलाया गया और मीडिया को भी रोका गया।
    डॉक्टर और अस्पताल का बचाव:
  • स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं: डॉ. रश्मि शर्मा के अनुसार, मरीज प्रसव पीड़ा के बजाय चेस्ट और बैक पेन के साथ आई थी और उसे अत्यधिक खांसी थी, जिसके कारण तुरंत ऑपरेशन करना खतरनाक हो सकता था।
  • प्रोटोकॉल का पालन: डॉक्टर का दावा है कि उन्होंने सभी मेडिकल प्रोटोकॉल का पालन किया है और बच्चे को बचाने की हर संभव कोशिश की गई।
    प्रशासनिक हस्तक्षेप: जांच के घेरे में अस्पताल
    मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कलेक्टर डॉ. संजय अग्रवाल और एसपी रजनेश सिंह ने तुरंत संज्ञान लिया है। CMHO डॉ. शुभा गढेवाल ने मामले की जांच के लिए एक टीम गठित कर दी है, जिसकी रिपोर्ट आने के बाद आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
    विश्लेषण: सोशल मीडिया और न्याय की मांग
    इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू व्हाट्सएप पर “Metoo Movement” का सक्रिय होना है, जिसमें सैंकड़ों से अधिक सदस्य जुड़ चुके हैं। यह दिखाता है कि आम जनता में चिकित्सा तंत्र के प्रति असंतोष किस कदर बढ़ रहा है। हालांकि, यह भी सच है कि चिकित्सा लापरवाही एक तकनीकी विषय है जिसे केवल विशेषज्ञ समितियां ही सिद्ध कर सकती हैं। भावनाएं और तथ्य अक्सर ऐसे मामलों में टकराते नजर आते हैं।
    आज की स्थिति: “हमारा बच्चा नहीं लौटेगा, पर दूसरों की जान बचानी है”
    पीड़ित परिवार ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। परिवार द्वारा जारी अपील में कहा गया है:

पीड़ित परिवार का कहना है हमारा बच्चा वापस नहीं आएगा, पर आपके सहयोग से कई और बच्चों की जान बचाई जा सकती है।”

बिलासपुर के नागरिक अब इस प्रदर्शन और प्रशासन की जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। क्या यह केवल एक मेडिकल कॉम्प्लिकेशन था या वास्तव में आपराधिक लापरवाही? इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।


डिस्क्लेमर: यह लेख सोशल मीडिया पर प्रसारित संदेशों और समाचार पत्रों की रिपोर्ट्स पर आधारित है। हमारी वेबसाइट किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं करती है और निष्पक्ष जांच का समर्थन करती है।

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