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समुद्र पर फिर लौटेगा 2000 साल पुराना भारतीय गौरव: बिना इंजन और जीपीएस के ओमान फतह करेगा ‘कौंडिन्य’

आज जब दुनिया ऑटोनॉमस जहाजों और सैटेलाइट नेविगेशन की बात कर रही है, भारत अपने उस स्वर्णिम इतिहास को फिर से जीने जा रहा है जिसने कभी दुनिया के समुद्री व्यापार पर राज किया था। अजंता की गुफाओं में मिले 2000 साल पुराने चित्रों से निकलकर एक जहाज हकीकत में समंदर की लहरों पर उतर चुका है। इसका नाम है—आईएनएसवी कौंडिन्य (INSV Kaundinya)।

प्राचीन इंजीनियरिंग का चमत्कार: न कील, न इंजन,जहाज निर्माण की इस कला को देखकर आधुनिक इंजीनियर भी हैरान हैं। ‘कौंडिन्य’ को बनाने में लोहे की एक भी कील का इस्तेमाल नहीं किया गया है। गोवा के कारीगरों ने प्राचीन ‘टांका पद्धति’ को पुनर्जीवित करते हुए लकड़ी के विशाल तख्तों को नारियल की रस्सियों से सिलकर इस जहाज को तैयार किया है।

अजंता एलोरा में मिला प्राचीन पद्धति का नाव का गुफा चित्र
  • हवा ही है सारथी: इसमें कोई इंजन नहीं लगा है। यह पूरी तरह से चौकोर सूती पाल (Sails) और हवा के दबाव पर निर्भर है।
  • परंपरागत नेविगेशन: बिना जीपीएस के, नाविक सितारों और समुद्री हवाओं के प्राचीन ज्ञान के सहारे रास्ता खोजेंगे।
    मिशन ‘कौंडिन्य’: पोरबंदर से ओमान तक का सफर
    यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि भारत की समुद्री विरासत का शक्ति प्रदर्शन है। 2023 में भारत सरकार द्वारा स्वीकृत इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य दुनिया को यह दिखाना है कि सदियों पहले भारतीय नाविक किस तरह अदम्य साहस के साथ सात समंदर पार किया करते थे।
    सफर के मुख्य बिंदु:
  • प्रस्थान: पोरबंदर, गुजरात।
  • गंतव्य: ओमान।
  • दूरी और समय: 1400 किलोमीटर (750 नॉटिकल माइल्स) की यह दूरी लगभग 15 दिनों में तय होगी।
  • चालक दल: 16 जांबाज नाविक, जो महीनों से इस पुरानी तकनीक को सीखने के लिए कठिन प्रशिक्षण ले रहे हैं।
    जहाज का स्वरूप (Dimensions)
  • लंबाई: 65 फीट
  • चौड़ाई: 22 फीट
  • वजन: 50 टन
  • ऊंचाई: 13 फीट
    विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण: क्यों महत्वपूर्ण है यह यात्रा?
    यह यात्रा केवल एक रिकॉर्ड बनाने के लिए नहीं है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
  • सांस्कृतिक पुनर्जागरण: भारत अपनी खोई हुई समुद्री पहचान को वापस पा रहा है।
  • टिकाऊ तकनीक (Sustainability): पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों (लकड़ी, रस्सी, सूती कपड़ा) से बना यह जहाज पर्यावरण अनुकूल नौवहन का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • कौशल का प्रदर्शन: ‘टांका पद्धति’ जैसी विलुप्त होती कलाओं को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाना।
    निष्कर्ष:
    जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस जहाज को हरी झंडी दिखाएंगे, तो वह केवल एक लकड़ी के जहाज को रवाना नहीं करेंगे, बल्कि भारत के उस आत्मविश्वास को रवाना करेंगे जो सदियों पहले ‘विश्व गुरु’ होने की पहचान था। ‘कौंडिन्य’ की लहरों पर यह सवारी हमें याद दिलाएगी कि भविष्य की राहें कभी-कभी अतीत के पन्नों से ही निकलती हैं।
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