एडिटर्स कॉलमघटनाचक्रजागरूकताटेक्नोलॉजीप्रशासनराष्ट्रीय खबर
आपके फ़ोन में चुपके से दाखिल होगा’संचार साथी’: करेगा जासूसी या बनेगा सुरक्षा कवच?

भारत सरकार के दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा लॉन्च किया गया ‘संचार साथी’ (Sanchar Saathi) ऐप आजकल सिर्फ तकनीकी गलियारों में नहीं, बल्कि सीधे हमारे अंतरमन तक बहस का मुद्दा बन गया है। सरकार इसे साइबर फ्रॉड और फोन चोरी के खिलाफ एक ‘सुरक्षा कवच’ बता रही है, लेकिन एप्पल जैसी बड़ी कंपनियों और गोपनीयता विशेषज्ञों की आपत्तियाँ सवाल खड़े कर रही हैं: क्या यह वाकई जनहित में है, या यह डिजिटल इंडिया में बढ़ते हुए सरकारी नियंत्रण की आहट है?
🎯 रोचक सवाल: ‘साथी’ क्यों मांग रहा है इतनी ‘आज़ादी’?
एक सामान्य सरकारी ऐप के रूप में, ‘संचार साथी’ कुछ ऐसी अनुमतियाँ (Permissions) मांगता है जो सीधे तौर पर हमारे निजी जीवन को छूती हैं। यह ऐप आपसे कॉल और SMS लॉग, कैमरा एक्सेस, और स्टोरेज एक्सेस की अनुमति मांगता है।
एक आम नागरिक के मन में पहला सवाल यही आता है:
- “क्या यह मेरे फ़ोन से डेटा डिलीट कर सकता है?”
- तथ्य: नहीं। इसके पास सीधे तौर पर किसी अन्य ऐप का डेटा या व्यक्तिगत फ़ाइलें डिलीट करने की क्षमता नहीं है। इसकी पहुँच इसके विशिष्ट कार्यों तक सीमित है।
- “क्या यह मेरी गैलरी के फोटो-वीडियो देख सकता है?”
- तथ्य: सीधे तौर पर नहीं। स्टोरेज एक्सेस की अनुमति केवल इसलिए ली जाती है ताकि आप फ्रॉड रिपोर्टिंग के लिए स्क्रीनशॉट या दस्तावेज़ अपलोड कर सकें। इसका उद्देश्य आपकी निजी तस्वीरों को स्कैन करना नहीं है।
लेकिन फिर सवाल उठता है कि अगर इसका इरादा केवल फ्रॉड रोकना है, तो सरकार इसे अनिवार्य क्यों बनाना चाहती है?
🚧 अनिवार्यता की दीवार: डिक्टेटरशिप की आहट?
असली विवाद तब शुरू हुआ जब सरकार ने स्मार्टफोन निर्माताओं को निर्देश दिया कि नए फोन में यह ऐप प्री-इंस्टॉल होकर आना चाहिए और पुराने फोन में यह सॉफ्टवेयर अपडेट के माध्यम से पहुँच जाए। सबसे बड़ा टकराव तब हुआ जब यह शर्त रखी गई कि इस ऐप के बिना डिवाइस को चालू (Activate) करना भी मुश्किल हो जाए।
आलोचकों ने इसे तुरंत “डिजिटल तानाशाही” (Digital Dictatorship) की ओर एक कदम बताया। उनके तर्क में दम है: - स्वतंत्रता पर अतिक्रमण: लोकतंत्र में, नागरिक को यह चुनने का अधिकार है कि उसके निजी उपकरण पर कौन सा सॉफ्टवेयर हो। सरकारी ऐप को जबरन थोपना, निजता के अधिकार पर सीधा अतिक्रमण है।
- मास सर्विलांस का डर: कॉल लॉग्स और SMS का एक्सेस होने का मतलब है कि, भले ही आज इरादा निगरानी का न हो, कल यह ऐप सामूहिक निगरानी (Mass Surveillance) का एक शक्तिशाली हथियार बन सकता है।
एप्पल जैसी कंपनियों ने भी विरोध किया, क्योंकि यह उनके वैश्विक गोपनीयता मानकों (Global Privacy Standards) के विपरीत है। एक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा तकनीकी कंपनियों पर अपनी इच्छा थोपना, कहीं न कहीं सत्ता के अत्यधिक नियंत्रण (Overreach) को ही उजागर करता है।
✨ निष्कर्ष: सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता का संतुलन
यह बहस ‘संचार साथी’ ऐप के लाभ या हानि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस नाजुक संतुलन के बारे में है जो एक आधुनिक लोकतंत्र को बनाए रखता है: सुरक्षा (Security) के लिए हम अपनी कितनी स्वतंत्रता (Liberty) कुर्बान करने को तैयार हैं?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि ऐप वैकल्पिक है और इसे डिलीट किया जा सकता है। यह कदम बताता है कि विरोध और नागरिक स्वतंत्रता के दबाव में सरकार ने थोड़ी नरमी दिखाई है।
लेकिन जब तक गोपनीयता और डेटा सुरक्षा को लेकर एक मजबूत कानूनी ढाँचा (जिसमें डेटा हटाने का अधिकार, डेटा भंडारण की अवधि, और स्पष्ट सहमति शामिल हो) पूरी तरह से स्थापित नहीं हो जाता, तब तक हर सरकारी ऐप, जो हमारे निजी संचार तक पहुँचता है, एक ‘सुरक्षा कवच’ से ज्यादा एक ‘डिजिटल जंजीर’ जैसा ही महसूस होगा।



