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करुणा और प्रेम के देश में बेजुबानों पर अत्याचार: सुप्रीम कोर्ट Vs पशु प्रेमी

वह समाज कैसा समाज है जो चंद बेजुबानों को सह नही पा रहा, और वह देश कैसा देश है जो अपने पशुओं से भी सहानुभूति नहीं रख सकता ,उनका त्याग करना चाहता है।

हमारी शहरी गलियों में घूमते-फिरते कुत्ते, जिन्हें अक्सर केवल “आवारा” कहकर पुकारा जाता है, वे सिर्फ जानवर नहीं हैं। वे हमारे समाज का एक अभिन्न अंग हैं, हमारे जीवन के ताने-बाने से गहराई से जुड़े हुए हैं। उनकी कहानी मानवीयता, संस्कृति और सह-अस्तित्व की एक जटिल बुनाई है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। हम इस संबंध के मानवीय और सांस्कृतिक पहलुओं पर प्रकाश डालना चाहते हैं, और यह समझना चाहते हैं कि कैसे इन बेजुबान साथियों के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण हमें एक बेहतर समाज की ओर ले जा सकता है।

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व: सदियों पुराना रिश्ता
भारत में कुत्तों का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व सदियों पुराना है। हिंदू धर्म में इन्हें पवित्र माना जाता है और भगवान भैरव का वाहन कहा गया है। महाभारत में युधिष्ठिर की वफादारी की कहानी में भी कुत्ते का विशेष स्थान है।

  • ग्रामीण जीवन में: ग्रामीण भारत में, कुत्ते हमेशा से खेतों और घरों के रखवाले रहे हैं। वे परिवार के सदस्य की तरह होते हैं, जो न केवल सुरक्षा प्रदान करते हैं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक बंधन भी साझा करते हैं। उनकी वफादारी और निस्वार्थ प्रेम किसी भी अन्य रिश्ते से कम नहीं है।
  • शहरी जीवन में: आज भी, कई शहरी इलाकों में, गली के कुत्ते समुदाय का हिस्सा बन जाते हैं। वे सुबह की सैर पर निकलने वालों के परिचित चेहरे होते हैं,चाय की टपरी पर कुछ बिस्किट के लिए इंतजार करने वाले साथी बन जाते हैं, बच्चों के अनौपचारिक खेल साथी होते हैं और रात में गलियों की सुरक्षा करते हैं।


मानवीय पहलू: प्यार, डर और जिम्मेदारी
आवारा कुत्तों के साथ हमारा मानवीय संबंध भावनाओं का एक जटिल मिश्रण है।हमें यह समझना होगा कि कुत्ते सिर्फ समस्या नहीं हैं, बल्कि वे हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं और हमारे मानवीय समाज के दर्पण भी। उनके प्रति हमारा व्यवहार हमारी सभ्यता का प्रतीक है।हम सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाएं जहां इंसान और ये बेजुबान साथी, दोनों सुरक्षित और सम्मान के साथ रह सकें।

हालिया घटनाक्रम और विवाद: सुरक्षा बनाम कल्याण

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर शेल्टर होम में भेजने का आदेश दिया है। इस आदेश का उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना, विशेषकर कुत्तों के काटने और रेबीज के बढ़ते मामलों को नियंत्रित करना है।

हालांकि, इस फैसले ने देश भर में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। कई सामाजिक संगठनों और बॉलीवुड हस्तियों ने इस आदेश पर अपनी गहरी नाराजगी जताई है:

  • मेनका गांधी जैसी प्रमुख पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कदम को “अव्यावहारिक”, “अमानवीय” और “पारिस्थितिक संतुलन के लिए हानिकारक” बताया है। उनका तर्क है कि लाखों कुत्तों के लिए पर्याप्त शेल्टर होम बनाना असंभव है।
  • जॉन अब्राहम, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, जान्हवी कपूर, वरुण धवन, और रवीना टंडन जैसे बॉलीवुड और राजनीतिक हस्तियों ने भी सोशल मीडिया और सार्वजनिक बयानों के माध्यम से इस आदेश का विरोध किया है। उन्होंने इसे “निर्दयी”, “अनुचित” और “दशकों से चली आ रही मानवीय और विज्ञान-आधारित नीति से पीछे हटना” करार दिया है।
  • PETA इंडिया जैसे पशु कल्याण संगठनों का मानना है कि यह समाधान स्थायी नहीं है और इसका वास्तविक हल वैज्ञानिक नसबंदी (Animal Birth Control – ABC) और टीकाकरण में निहित है।

ये सभी आवाजें एक ही बात पर ज़ोर देती हैं: सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन जानवरों के कल्याण की अनदेखी नहीं की जा सकती।

​सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व: भविष्य का मार्ग

इन जटिल परिस्थितियों में, सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व ही सबसे अच्छा और स्थायी उपाय है। इसका मतलब है:

  • वैज्ञानिक नसबंदी (ABC) और टीकाकरण: यह उनकी आबादी को नियंत्रित करने और रेबीज जैसे रोगों को खत्म करने का सबसे प्रभावी और मानवीय तरीका है।
  • जागरूकता और शिक्षा: लोगों को कुत्तों के व्यवहार, सुरक्षित बातचीत और जिम्मेदार पशु स्वामित्व के बारे में शिक्षित करना।
  • बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन: खुले में पड़े कचरे को कम करके कुत्तों को भोजन के लिए इकट्ठा होने से रोकना।
  • सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को शामिल करके, जहां लोग कुत्तों के प्रति दयालु हों और उनकी देखभाल में मदद करें, वहीं सुरक्षा प्रोटोकॉल का भी पालन करें।

यदि बड़ी संख्या में कुत्तों को शेल्टर होम्स में इकट्ठा किया जाता है, तो उनके कल्याण के साथ समझौता हो सकता है। खासकर तब, जब कुछ हलकों से कुत्तों के मांस के अवैध निर्यात की संभावना जताई जा रही हो। यह आरोप, अगर इसमें ज़रा भी सच्चाई है, तो बेहद गंभीर है और पशु कल्याण के सभी सिद्धांतों के खिलाफ है।

​गौशालाओं का कटु अनुभव: क्या कुत्तों को उचित भोजन मिल पाएगा?

यह आशंका तब और पुख्ता हो जाती है जब हम गौशालाओं की स्थिति पर गौर करते हैं। गायों, जिन्हें भारत में पवित्र माना जाता है, उनके लिए स्थापित कई गौशालाओं में ही चारे, पानी और उचित देखभाल का पर्याप्त प्रबंध नहीं हो पाता। अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि गौशालाओं में गायें भूख और बीमारी से मर रही हैं, और उन्हें उचित पोषण नहीं मिल रहा है।

जब ऐसी परिस्थितियों में, पूजनीय मानी जाने वाली गायों को ही पर्याप्त भोजन और देखभाल नहीं मिल पाती, तो यह कैसे मान लिया जाए कि लाखों की संख्या में इकट्ठा किए गए आवारा कुत्तों को, जिनके प्रति समाज का एक वर्ग पहले से ही नकारात्मक धारणा रखता है, उचित भोजन और मानवीय व्यवहार दिया जाएगा? यह एक वैध प्रश्न है जो व्यवस्था की क्षमता और नीयत पर सवाल उठाता है। यह अनुभव दर्शाता है कि केवल जानवरों को इकट्ठा कर लेना ही समाधान नहीं है; उनकी देखभाल के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, प्रशिक्षित स्टाफ और सच्ची प्रतिबद्धता होनी चाहिए।

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