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टाइपिंग की एक चूक या सिस्टम की बड़ी भूल? छत्तीसगढ़ प्रश्नपत्र विवाद से क्या मिले हैं सबक??

छत्तीसगढ़ के रायपुर के स्कूल में हाल ही में हुई अर्धवार्षिक परीक्षा के एक प्रश्नपत्र ने राज्य के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक में तूफान खड़ा कर दिया है।रायपुर जिले के तिल्दा विकास खंड के अंतर्गत नक्ती (खपरी)कक्षा चौथी के अंग्रेजी के पेपर में एक सवाल के विकल्प में ‘राम’ (Ram) नाम को कुत्ते के नाम के साथ जोड़ना न केवल एक प्रशासनिक चूक बनी, बल्कि इसने आस्था और अभिव्यक्ति के बीच की एक बारीक लकीर को भी उजागर कर दिया है।

क्या था पूरा मामला?
तिल्दा ब्लॉक के एक स्कूल में परीक्षा के दौरान सवाल पूछा गया कि “मोना के कुत्ते का क्या नाम है?”। विकल्पों में ‘शेरू’ और ‘बाला’ के साथ ‘राम’ नाम देखकर हड़कंप मच गया। हिंदू संगठनों के विरोध के बाद संबंधित हेडमिस्ट्रेस को सस्पेंड कर दिया गया और एक सहायक शिक्षिका को बर्खास्तगी का नोटिस थमा दिया गया।
मानवीय त्रुटि बनाम आस्था का सवाल
शिक्षिकाओं ने अपने स्पष्टीकरण में इसे ‘मानवीय भूल’ बताया है। उनका कहना है कि वे ‘रामू’ (Ramu) लिखना चाहते थे, लेकिन टाइपिंग के दौरान ‘U’ अक्षर छूट जाने से वह ‘Ram’ हो गया। यदि इस पक्ष को देखें, तो यह एक सामान्य कीबोर्ड एरर लगता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हमारी आस्थाएं इतनी नाजुक हैं कि एक टाइपिंग मिस्टेक से आहत हो जाएं? या फिर सवाल यह है कि क्या सरकारी तंत्र इतना लापरवाह हो चुका है कि वह भगवान के नाम और एक जानवर के नाम के बीच का अंतर भी री-चेक नहीं करता?

असली गुनहगार: ‘प्रूफ-रीडिंग’ का अभाव

इस घटना ने शिक्षा विभाग की पोल खोल दी है। प्रश्नपत्र तैयार होने से लेकर छपने और बच्चों तक पहुँचने के बीच कई स्तरों पर चेकिंग होती है।

  • मॉडरेशन कमेटी कहाँ थी? क्या किसी ने पेपर फाइनल होने से पहले उसे पढ़ा नहीं?
  • गोपनीयता के नाम पर लापरवाही: अक्सर गोपनीयता बनाए रखने के नाम पर पेपर को क्रॉस-चेक नहीं किया जाता, जिसका खामियाजा अब इन शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है।
  • सिस्टम का फेलियर: एक शिक्षक को सस्पेंड कर देना आसान है, लेकिन उस पूरे सिस्टम को दुरुस्त करना मुश्किल, जिसने इस त्रुटिपूर्ण पेपर को पास किया।
    पाठकों के लिए जागृति: सही दिशा क्या है?
    एक जिम्मेदार समाज के तौर पर हमें इस घटना को दो नजरियों से देखना होगा:
  • सहिष्णुता और समझ: यदि शिक्षक खुद हिंदू है और स्पष्ट कर रहा है कि यह टाइपिंग की गलती थी, तो हमें ‘इरादे’ और ‘गलती’ के बीच फर्क करना सीखना होगा। हर गलती साजिश नहीं होती।
  • प्रशासनिक जवाबदेही: जनता के तौर पर हमें शिक्षा विभाग से सवाल करना चाहिए कि बच्चों को दिए जाने वाले कंटेंट की गुणवत्ता की जांच क्यों नहीं होती? आज ‘राम’ लिखा है, कल किसी और महापुरुष या धर्म के बारे में गलत जानकारी दी जा सकती है।
    निष्कर्ष
    यह विवाद केवल एक नाम का नहीं है, बल्कि यह ‘प्रोफेशनलिज्म’ की कमी का है। शिक्षकों को टाइपिंग और डेटा एंट्री में अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है, तो वहीं शिक्षा विभाग को ‘प्रूफ-रीडिंग’ को अनिवार्य और सख्त बनाना होगा। किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना जितना गलत है, एक छोटी सी तकनीकी चूक के लिए किसी का करियर पूरी तरह खत्म कर देना भी बहस का विषय है।
    समय आ गया है कि हम भावनाओं के आवेग में बहने के बजाय, व्यवस्था को सुधारने की मांग करें ताकि भविष्य में किसी ‘रामू’ को गलती से ‘राम’ न बना दिया जाए।
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