धर्म की धुंध और संसाधनों की लूट: आधुनिक भारत के यक्ष-प्रश्न

आज का समय एक ऐसी विडंबना से गुजर रहा है जहाँ शोर बहुत है, पर संवाद गायब है। भव्य आयोजनों और गगनचुंबी नारों के बीच आम आदमी की बुनियादी जरूरतें कहीं खो गई हैं। इतिहास में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद को सत्य और ज्ञान का प्रतीक माना गया है, लेकिन आज के दौर में उसी सत्य को सत्ता की चकाचौंध और धर्म की आड़ में ढंक दिया गया है। जब हम अपनी आंखों से भ्रम की पट्टी हटाकर देखते हैं, तो कुछ गहरे प्रश्न उभरते हैं जिनका उत्तर ढूंढना आज हर नागरिक के लिए अनिवार्य हो गया है।
विकास की चमक या संपदा की नीलामी?
पहला बड़ा प्रश्न उन संसाधनों को लेकर उठता है जो इस देश की साझा विरासत हैं। जल, जमीन, जंगल और कोयला—ये किसी सरकार या किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा हैं। लेकिन आज ‘विकास’ के एक ऐसे मॉडल को थोपा जा रहा है जहाँ इन प्राकृतिक संपदाओं को बड़ी चतुराई से कुछ चुनिंदा व्यापारिक घरानों की तिजोरियों में बंद किया जा रहा है।
जब देश की सार्वजनिक संपत्तियाँ निजी हाथों में जाती हैं, तो वह केवल मुनाफे का सौदा नहीं होता, बल्कि आम आदमी के अधिकारों का समर्पण होता है। जिस कोयले और जमीन पर पूरे देश का हक होना चाहिए, उसे ‘मित्र-कल्याण’ की भेंट चढ़ा देना भविष्य के लिए एक बड़ा संकट पैदा कर रहा है।
धर्म का धुआं और गुमराह जनता
एक गहरा सवाल यह भी है कि आखिर जनता इस खुली लूट को देख क्यों नहीं पा रही? इसका उत्तर उस राजनीतिक चातुर्य में छिपा है जो धर्म और भावनाओं का उपयोग एक ‘पर्दे’ की तरह करता है। जब-जब संसाधनों के बंटवारे पर सवाल उठने की संभावना होती है, तब-तब समाज के सामने पहचान और धर्म का एक नया विवाद खड़ा कर दिया जाता है।
धर्म, जो आत्मिक शांति का मार्ग होना चाहिए था, आज उसे राजनीतिक हथियार बना दिया गया है। जनता को मंदिर-मस्जिद और नफरत के ऐसे धुएं में उलझा दिया गया है कि उसे पीछे के दरवाजे से बेची जा रही अपनी ही जमीन और जंगल दिखाई नहीं दे रहे। सत्ता लोलुप नेता जानते हैं कि जब तक लोग आपस में लड़ते रहेंगे, वे कभी सत्ता से जवाबदेही नहीं मांगेंगे।
विरोध का दमन और खामोश लोकतंत्र
लोकतंत्र की खूबसूरती सवाल पूछने में है, लेकिन आज सवाल पूछना ही सबसे बड़ा जोखिम बन गया है। जो कोई भी जल, जमीन या निजीकरण के खिलाफ आवाज उठाता है, उसे तंत्र की पूरी शक्ति लगाकर चुप करा दिया जाता है। कभी कानूनों का डर दिखाकर, तो कभी राष्ट्रवाद की गलत व्याख्या करके असहमति के हर स्वर को कुचलने की कोशिश की जा रही है।
जब सत्ता केवल प्रशंसा सुनने की आदी हो जाए और आलोचना करने वालों को अपराधी की तरह देखने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की सांसें संकट में हैं। डरा हुआ समाज कभी भी सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता।
जागरूकता: ज्ञान का असली प्रकाश
इस अंधेरे को मिटाने का एकमात्र तरीका ‘ज्ञान का प्रकाश’ है। जनता को यह समझना होगा कि उनके असली मुद्दे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अपनी जमीन की सुरक्षा हैं। असली राष्ट्रवाद वह है जो देश की संपदा को चंद हाथों में सिमटने से रोके।
जिस दिन आम आदमी धर्म के नाम पर फैलाए गए भ्रम को छोड़कर अपने अधिकारों का हिसाब मांगेगा, उसी दिन सत्ता की लोलुपता और पूंजीपतियों का यह गठजोड़ टूटेगा। जागरूकता ही वह मंत्र है जो गुमराह जनता को फिर से सजग नागरिक बना सकता है। हमें यह याद रखना होगा कि यदि आज हम अपनी चुप्पी नहीं तोड़ेंगे, तो भविष्य में हमारे पास बचाने के लिए न तो जंगल बचेंगे और न ही वह जमीन जिस पर खड़े होकर हम गर्व कर सकें।



