पुरी, ओडिशा: ओडिशा के इतिहास में सालबेग (17वीं शताब्दी) का नाम भक्ति और सहिष्णुता के प्रतीक के रूप में अमर है। एक मुस्लिम होकर भी वे भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे, और उनकी कहानी धर्म, प्रेम व अटूट विश्वास का प्रेरणादायक उदाहरण है।

युद्ध से भक्ति तक का सफर
सालबेग का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था।उनके पिता, लालबेग, मुगल सेना में सूबेदार थे। बचपन में, वे पिता के साथ युद्ध अभियानों में भाग लेते थे। एक युद्ध में वे गंभीर रूप से घायल हो गए और उनके ठीक होने की उम्मीद न थी।
इसी दौरान, सालबेग को भगवान जगन्नाथ पर गहरी आस्था हुई। उन्होंने पूरी निष्ठा से भगवान का नाम जपना शुरू किया। चमत्कारिक रूप से, उनके घाव ठीक हो गए। इस घटना ने उनके जीवन को बदल दिया। उन्हें विश्वास हो गया कि यह भगवान का ही आशीर्वाद है। उन्होंने तुरंत युद्ध और सांसारिक मोहमाया को त्याग कर अपना जीवन भगवान जगन्नाथ की भक्ति में समर्पित करने का संकल्प लिया।
जगन्नाथ के प्रति असीम प्रेम
सालबेग पुरी आ गए, जहाँ भगवान जगन्नाथ का मंदिर है। मुस्लिम होने के कारण उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी, पर यह बात उनकी भक्ति के आड़े नहीं आई। वे मंदिर के बाहर रहकर दिन-रात भगवान के भजनों की रचना करते और उन्हें गाते थे। उनके भजन इतने भावपूर्ण थे कि वे सभी को मंत्रमुग्ध कर देते थे।
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है ‘आहे नीलाशैला’ (हे नीलांचल पर्वतवासी), जिसमें वे भगवान जगन्नाथ को संबोधित करते हुए अपने दर्शन की लालसा व्यक्त करते हैं। यह भजन आज भी ओडिशा में रथ यात्रा के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है।
रथ यात्रा का चमत्कार
सालबेग के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना पुरी की रथ यात्रा से जुड़ी है। एक बार वे किसी कारणवश रथ यात्रा के दौरान पुरी नहीं पहुँच पाए थे। रास्ते में उनकी तबीयत खराब हो गई और वे चल नहीं पा रहे थे। उनकी आँखों में आँसू थे और वे भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि वे उनका इंतजार करें।
किंवदंती के अनुसार, भगवान जगन्नाथ ने अपने अनन्य भक्त की पुकार सुनी। जब सालबेग पुरी के पास पहुँचे, तो रथ यात्रा रुक गई थी। रथ अपनी जगह से हिल ही नहीं रहा था। जैसे ही सालबेग रथ के पास पहुँचे और भगवान के दर्शन किए, तभी रथ ने आगे बढ़ना शुरू किया। यह घटना सालबेग की भक्ति और भगवान जगन्नाथ के प्रति उनके प्रेम का एक जीवित प्रमाण बन गई।
अमर विरासत
सालबेग ने सैकड़ों भजन और कविताएँ लिखीं, जो आज भी उड़िया साहित्य और भक्ति परंपरा का अभिन्न अंग हैं। उनकी रचनाएँ न केवल भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी गहरी आस्था को दर्शाती हैं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता और प्रेम के संदेश को भी प्रसारित करती हैं। उन्होंने दिखाया कि सच्ची भक्ति किसी भी धर्म, जाति या पंथ की सीमाओं से परे होती है।
सालबेग का मज़ार आज भी पुरी में गुंडिचा मंदिर के पास स्थित है, जहाँ भक्त और पर्यटक उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम और भक्ति की कोई सीमा नहीं होती और भगवान अपने सच्चे भक्तों की पुकार हमेशा सुनते हैं।




