
सिनेमा क्या है? क्या यह सिर्फ करोड़ों का बजट और चमक-धमक है? रायपुर साहित्य उत्सव के ‘श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप’ में जब बिलासपुर की माटी से निकले अभिनेता सत्यजीत दुबे ने बोलना शुरू किया, तो सिनेमा की परिभाषा बदली-बदली सी नज़र आई। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा, “फिल्म की उम्र उसका बजट नहीं, बल्कि उसकी सच्चाई तय करती है।”
छत्तीसगढ़ की माटी में छिपी हैं सिनेमा की जड़ें
सत्यजीत दुबे के लिए रायपुर का यह उत्सव सिर्फ एक औपचारिक चर्चा नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों की ओर वापसी थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि छत्तीसगढ़ का लोकजीवन, यहाँ का समृद्ध साहित्य और सामाजिक अनुभव भारतीय सिनेमा के लिए वह ‘रॉ मटेरियल’ हैं, जिन पर ऐसी फिल्में बन सकती हैं जो सदियों तक याद रखी जाएँ। आज का दर्शक कृत्रिम चेहरों से ऊब चुका है, उसे ओटीटी के पर्दे पर ‘असली इंसान’ और ‘सच्ची कहानियाँ’ देखनी हैं।
बिलासपुर से मुंबई: एक लंबा और कड़ा सफर
सत्यजीत की कहानी किसी ‘ओवरनाइट सक्सेस’ का हिस्सा नहीं है। यह कहानी है 2007 की, जब बिलासपुर का एक लड़का आँखों में बड़े सपने लेकर मुंबई की भीड़ में शामिल हुआ था।
- थिएटर की पाठशाला: उन्होंने अभिनय का पहला पाठ मंच (थिएटर) पर सीखा, जहाँ किरदारों को जीने का सलीका आया।
- विज्ञापनों का दौर: संघर्ष के दिनों में हार नहीं मानी और पिज्जा हट, किटकैट और एचडीएफसी बैंक जैसे बड़े ब्रांड्स के विज्ञापनों के जरिए खुद को टिकाए रखा।
- पहला बड़ा ब्रेक: महज़ 20 साल की उम्र में उन्हें शाहरुख खान के प्रोडक्शन की फिल्म ‘ऑलवेज कभी कभी’ में मुख्य भूमिका मिली।
ओटीटी की दुनिया में एक विश्वसनीय नाम
सत्यजीत आज उन गिने-चुने अभिनेताओं में शामिल हैं, जिन्हें उनकी सादगी और संजीदगी के लिए जाना जाता है। ‘मुंबई डायरीज 26/11’ में डॉ. अहान मिर्जा के संवेदनशील किरदार ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। इसके अलावा ‘बेस्टसेलर’, ‘रणनीति: बालाकोट एंड बियॉन्ड’ और ‘झांसी की रानी’ में नाना साहेब के रूप में उनके काम ने यह साबित किया कि एक कलाकार के लिए उसकी ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।
युवाओं के लिए संदेश: ‘शॉर्टकट से बचिए’
मंच से युवाओं को संबोधित करते हुए सत्यजीत ने कोई भारी-भरकम उपदेश नहीं दिया, बल्कि एक गहरी बात कही। उन्होंने कहा कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। यदि आप खुद के प्रति ईमानदार नहीं हैं, तो आपका निभाया गया किरदार भी कभी पर्दे पर ईमानदार नहीं दिख सकता।
इसी सत्र में सुविज्ञा दुबे ने भी बच्चों के आत्मविश्वास और उनकी अभिव्यक्ति में परिवार की भूमिका को रेखांकित किया, जिससे यह चर्चा केवल सिनेमा तक सीमित न रहकर समाज और संस्कारों तक जा पहुँची।


