घटनाचक्रनदियाँराष्ट्रीय खबर

महानदी जल विवाद: ओडिशा और छत्तीसगढ़ में बनी सहमति, क्या खत्म होगा बरसों पुराना टकराव?

भुवनेश्वर/रायपुर: ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच बरसों से चले आ रहे ‘महानदी जल विवाद’ को सुलझाने की दिशा में एक बहुत बड़ी और सकारात्मक उम्मीद जागी है। महानदी की लहरों पर हक को लेकर अदालती चौखट पर डटे दोनों राज्य अब आपसी बातचीत से इस मसले का स्थायी हल निकालने के लिए तैयार हो गए हैं। ओडिशा सरकार द्वारा बढ़ाए गए बातचीत के हाथ को पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ ने भी थाम लिया है।
इस फैसले के बाद अब यह उम्मीद लगाई जा रही है कि दशकों पुरानी इस खींचतान का अंत सौहार्दपूर्ण तरीके से हो सकेगा। आइए समझते हैं कि ट्रिब्यूनल की सुनवाई में क्या हुआ और आगे की राह क्या होगी।

ट्रिब्यूनल में क्या हुआ? (जस्टिस बेला त्रिवेदी की अध्यक्षता में सुनवाई)

महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (Tribunal) की अध्यक्ष न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी की अध्यक्षता में इस मामले की अहम सुनवाई हुई। इस दौरान दोनों राज्यों के रुख में बड़ा बदलाव देखने को मिला। ओडिशा के एडवोकेट जनरल पीतांबर आचार्य के अनुसार, दोनों पक्षों ने ट्रिब्यूनल के सामने स्पष्ट किया कि वे कोर्ट-कचहरी के बजाय आपस में बैठकर संवाद के जरिए इस गंभीर विवाद का एक सर्वमान्य और स्थायी समाधान चाहते हैं।

छत्तीसगढ़ देगा लिखित आश्वासन, 23 जुलाई को अगली नजर

छत्तीसगढ़ सरकार ने ट्रिब्यूनल के समक्ष यह साफ कर दिया कि वह ओडिशा के साथ हर टेबल टॉक (आपसी चर्चा) के लिए पूरी तरह तैयार है। दोनों राज्यों के इस सकारात्मक रवैये को देखते हुए ट्रिब्यूनल ने छत्तीसगढ़ सरकार को एक निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि छत्तीसगढ़ इस बातचीत की प्रतिबद्धता को लेकर एक औपचारिक लिखित आश्वासन (Written Commitment) अदालत में दाखिल करे। इस मामले की अगली सुनवाई अब 23 जुलाई को होनी है, जिससे पहले छत्तीसगढ़ को यह लिखित दस्तावेज सौंपना होगा।

पाठकों के लिए समझना क्यों जरूरी है यह विवाद?

महानदी को ओडिशा की ‘लाइफलाइन’ (जीवनरेखा) कहा जाता है। छत्तीसगढ़ द्वारा नदी के ऊपरी हिस्से पर बांध और बैराज (जैसे कलमा बैराज) बनाने के कारण ओडिशा का आरोप रहा है कि गैर-मानसून सीजन में उसके हिस्से का पानी कम हो जाता है। इससे ओडिशा के किसानों और तटीय इलाकों के मछुआरों की रोजी-रोटी पर सीधा संकट गहराने लगा था। पानी की इसी कमी और हक की लड़ाई को लेकर दोनों राज्य ट्रिब्यूनल पहुंचे थे।

क्यों अहम है यह कदम?

कानूनी जानकारों का मानना है कि अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद दशकों तक अदालतों में खिंचते रहते हैं, जिससे जमीनी स्तर पर जनता को कोई राहत नहीं मिलती। ऐसे में दोनों राज्यों का आपसी बातचीत के लिए राजी होना एक बेहद परिपक्व और स्वागत योग्य कदम है। अगर 23 जुलाई की सुनवाई से पहले दोनों सरकारें एक ठोस रोडमैप तैयार कर लेती हैं, तो यह न सिर्फ देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) के लिए एक बेहतरीन मिसाल बनेगा, बल्कि दोनों राज्यों के लाखों किसानों और आम जनता के लिए भी बड़ी राहत लेकर आएगा।

Join Dainik Bodh Whatsapp Community

Related Articles

Back to top button