
बीते दिनों भोपाल में एक पारिवारिक समारोह हुआ। मंच एक निजी आयोजन का था, लेकिन उपस्थिति ऐसी थी जिसने पूरे छत्तीसगढ़ की राजनीति को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। पूर्व ‘सुपर ब्यूरोक्रेट’ और वर्तमान में अडानी समूह के ‘प्रेसिडेंट स्ट्रेटजी’ अमन सिंह के बेटे के स्वागत समारोह में छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री और पूरी भाजपा सरकार का शीर्ष नेतृत्व मौजूद था।
यह उपस्थिति सिर्फ एक ‘सौजन्य भेंट’ नहीं, बल्कि शक्ति, प्रभाव और कॉर्पोरेट-राजनीतिक गठजोड़ की वह स्पष्ट तस्वीर है, जो यह साबित करती है कि छत्तीसगढ़ की सत्ता की चाबी आज भी किसके हाथों में है।
🔑 ‘हाईजैक’ की कहानी, जो कभी खत्म नहीं होती
15 साल के रमन सिंह शासनकाल में अमन सिंह को ‘सुपर सीएम’ का दर्जा हासिल था। उन पर आरोप थे कि उन्होंने ही सरकार को ‘हाईजैक’ किया। 2018 में भाजपा हारी, लेकिन भोपाल में जुटी भीड़ ने साफ कर दिया: सत्ता बदली है, शक्ति का केंद्र नहीं!
जो अधिकारी कल तक सरकारी नीतियों के नियम-नियंता थे, आज वे देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक के लिए रणनीति तय कर रहे हैं। और जब पूरी राजनीतिक जमात एक साथ उनके दरवाजे पर दस्तक देती है, तो इसका सीधा अर्थ है: छत्तीसगढ़ की राजनीति को आज भी उनकी और उनके वर्तमान नियोक्ता की ‘रणनीति’ की ज़रूरत है।
🌳 जल, जंगल, जमीन: डर का कारण
यह मिलन साधारण नहीं है; यह सीधे तौर पर सरगुजा, बस्तर और रायगढ़ के भविष्य से जुड़ा है।
- हसदेव अरण्य की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
- कोयला और खनिज के नए आवंटन की फाइलें खुलने वाली हैं।
- किसानों की ज़मीनें अधिग्रहण के लिए तैयार हैं।
जब सरकार का शीर्ष नेतृत्व एक ऐसे मंच पर उद्योगपतियों के रणनीतिकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होता है, तो सबसे पहले विश्वास टूटता है। जनता सवाल पूछती है: क्या अब जंगल बचाने की आवाज सुनी जाएगी, या कॉर्पोरेट एजेंडे को ‘ग्रीन सिग्नल’ मिलेगा? क्या यह मिलन, छत्तीसगढ़ के संसाधनों पर बड़े औद्योगिक फैसलों की ‘सुपर डील’ की नींव तो नहीं है?
⚠️ जनता का जनादेश बनाम कॉर्पोरेट कमांड
2018 में छत्तीसगढ़ की जनता ने 15 साल के शासन को इसीलिए खारिज किया था कि उन्हें लगा कि सत्ता चंद लोगों के हाथ में सिमट गई है और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है।
अगर वर्तमान सरकार, जिसके पास जनता का नया जनादेश है, पुरानी सत्ता संरचना के सबसे विवादास्पद केंद्रों को इतनी सहजता से स्वीकार कर लेती है, तो यह संदेश जाता है कि ‘हम वही पुरानी लीक पर चलेंगे।’
यह सिर्फ एक पार्टी की ख़बर नहीं है, यह शासन के पारदर्शिता और जवाबदेही के मौलिक सिद्धांतों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। बात निकली है तो दूर तलक जाएगी—यह सिर्फ एक मुहावरा नहीं, यह छत्तीसगढ़ की जनता का अब अधिकार है कि वे जानें: सरकार किसकी है? जनता की, या उन ताकतों की, जो भोपाल के भव्य समारोहों में रणनीति बनाती हैं?
सत्ता को याद रखना होगा: कॉर्पोरेट गठजोड़ भले ही मजबूत हो, लेकिन लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के हाथ में होती है, और जनता हर कदम का हिसाब जरूर लेती है।



