
कोरबा, छत्तीसगढ़।
देश में कोयला उत्पादन बढ़ाने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने कमर्शियल कोल माइनिंग के 14वें चरण की नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस चरण में, छत्तीसगढ़ की 15 कोयला खदानों को सूचीबद्ध किया गया है, लेकिन सबसे बड़ा पर्यावरणीय सवाल कोरबा जिले से उठ रहा है, जहाँ 5 ब्लॉक दोबारा बोली प्रक्रिया में शामिल किए गए हैं।
🚨 ‘विकास’ बनाम ‘विनाश’: कोरबा के ‘फेफड़े’ खतरे में
कोरबा, जिसे ‘उर्जाधानी’ के नाम से जाना जाता है, उसकी पहचान केवल कोयले से नहीं, बल्कि घने जंगलों से भी है। नीलामी के लिए चिन्हित किए गए कोरबा के पाँचों ब्लॉक (जिनमें तौलीपाली, बताती कोल्गा वेस्ट, मदवानी, करतला साउथ आदि शामिल हैं) घने वन क्षेत्र के बीच स्थित हैं।
स्थानीय पर्यावरणविदों और नागरिकों का मानना है कि ये जंगल कोरबा के लिए ‘फेफड़े’ की तरह हैं।
विशेषज्ञों की राय: इन 5 कोल ब्लॉकों के सक्रिय होने से अनुमानित 12,725 मिलियन टन से अधिक का कोयला भंडार तो निकल सकता है, जिससे राज्य को भारी राजस्व मिलेगा, लेकिन इसके लिए एक बड़े जंगल क्षेत्र को काटना होगा। इससे जैव विविधता का नुकसान होगा और क्षेत्र में वायु तथा जल प्रदूषण का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
🛣️ संतुलन की तलाश
केंद्र सरकार ने इस नीलामी को ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के तहत बड़ा कदम बताया है और खनन के लिए अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (UCG) जैसी नई तकनीकें भी पेश की हैं, जो पर्यावरण पर कम प्रभाव डालती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पारंपरिक ओपन कास्ट माइनिंग (खुले गड्ढे से खनन) अभी भी बड़े पैमाने पर होती है, और घने जंगल वाले ब्लॉकों में खनन शुरू करना सीधा-सीधा पर्यावरणीय समझौता होगा।
कोरबा के सामने अब एक बड़ी चुनौती है: एक ओर आर्थिक विकास की रफ्तार है और दूसरी ओर स्थानीय पर्यावरण का संरक्षण। उर्जाधानी की यह गड़गड़ाहट क्षेत्र के विकास को आगे ले जाएगी, या सदियों पुराने जंगल को निगल जाएगी? इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।
❓ आगे क्या?
कोयला मंत्रालय को जल्द ही बोलीदाताओं से आवेदन मिलने शुरू हो जाएंगे। अब देखना यह है कि क्या राज्य सरकार और केंद्र सरकार इन संवेदनशील क्षेत्रों में खनन शुरू करने से पहले पर्यावरण मंजूरी और स्थानीय लोगों के पुनर्वास को लेकर कोई सख्त और स्पष्ट नीति बनाती हैं।



