
अभी हाल ही में बिलासपुर जिले के सीपत थाने से एक ऐसी खबर आई, जिसने सोशल मीडिया पर ‘तूफ़ान’ ला दिया। हुआ यूँ कि थाने के शौचालय का टूटा हुआ दरवाज़ा ढँकने के लिए, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के तस्वीरों वाले एक पोस्टर का इस्तेमाल किया गया। चंद ही घंटों में, किसी की ‘नज़र’ उस पर पड़ी, तस्वीर खींची गई और आज के ‘वायरल युग’ में यह ‘गुनाह’ पूरे राज्य में फैल गया। नतीजा? थाना प्रभारी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी।यह घटना सिर्फ एक थाने या एक अधिकारी की नहीं है; यह हमारे समाज की एक गहरी विडंबना को उजागर करती है जो है नेताओं के पोस्टरों का जन्म, उनकी क्षणिक महिमा और उनका अपमानजनक अंत।।
पोस्टरों का शौक और उनका हश्र:भारत की राजनीति में नेताओं के पोस्टरों का एक अलग ही महत्व है। चाहे किसी भी पार्टी का नेता हो, जब भी कोई बड़ा कार्यक्रम या रैली होती है, तो शहर की गलियाँ, चौराहे और सड़कें इन ‘कागज़ी देवताओं’ से पट जाती हैं। ये पोस्टर केवल सूचना नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक होते हैं। कार्यकर्ता इन्हें बड़े चाव से लगाते हैं, मानो वे कोई युद्ध जीत रहे हों।लेकिन, जैसे ही सभा समाप्त होती है, इन पोस्टरों की नियति बदल जाती है। जिस ‘महानुभाव’ को कुछ घंटे पहले सम्मान दिया जा रहा था, उसके पोस्टर कबाड़ बन जाते हैं। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि इन पोस्टरों का अंतिम हश्र क्या होता है?
- कोई मज़दूर इसे अपने टूटे-फूटे घर की छत की अस्थायी मरम्मत के लिए ले जाता है।
- कोई इसे बिस्तर के नीचे बिछाता है, ताकि ज़मीन की ठंडक से बचा जा सके।
- और, जैसा कि सीपत थाने में हुआ, कोई इसे टूटे दरवाज़े या खिड़की को ढँकने के काम में ले आता है।
- अधिकांशतः, ये सड़क किनारे, कूड़े के ढेर या नालियों में पड़े मिलते हैं—वही नेता, जिनकी तस्वीरों पर कुछ देर पहले फूल मालाएँ चढ़ाई जा रही थीं।
क्या यह वास्तव में ‘गुनाह’ है?
सीपत थाने के प्रभारी पर हुई कार्यवाही कई सवाल खड़े करती है। यह मानना बचकाना होगा कि थाना प्रभारी ने जान-बूझकर, स्वयं अपने हाथों से यह पोस्टर टॉयलेट के बाहर लगाया होगा। यह किसी मातहत की नासमझी हो सकती है, किसी की खुराफात या फिर बस, एक टूटी हुई चीज़ को ढँकने की आपातकालीन ज़रूरत।
सवाल यह है: जब नेताओं को स्वयं पता है कि हज़ारों रुपये खर्च करके छपवाए गए इन पोस्टरों का अंत इसी तरह होने वाला है, तो फिर इतनी फिजूलखर्ची क्यों? जिस पोस्टर को कुछ घंटों बाद कूड़े में फेंक दिया जाना है, क्या उसे इस्तेमाल करना वास्तव में इतना बड़ा ‘राजद्रोह’ है?
सोशल मीडिया का ‘नेगेटिव इंपैक्ट’:
आजकल सोशल मीडिया एक ऐसा मंच बन गया है, जहाँ तर्क और विचार दूर की कौड़ी हैं। यहाँ ‘सनसनी’ और ‘नेगेटिविटी’ का सिक्का चलता है। सकारात्मक और समाज को दिशा देने वाली बातों की जगह, छोटी-छोटी नकारात्मक घटनाएँ तेज़ी से वायरल होती हैं। सीपत थाने की घटना इसका ज्वलंत उदाहरण है। सच्चाई को जानने, तर्कशील बातों को समझने या यह सोचने की बजाय कि ‘पोस्टरों की बर्बादी’ एक बड़ा मुद्दा है, सोशल मीडिया केवल उस ‘गलती’ को फैलाने में लग गया, जिससे एक अधिकारी को सज़ा मिली। यह समाज में सीधे ‘फल’ (नकारात्मक परिणाम) को परोस देता है, ‘कारण’ की जड़ों को जानने का प्रयास नहीं करता।
एक अपील, एक ज़िम्मेदारी:
समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और नेता एक सामूहिक ज़िम्मेदारी लें। - पहला कदम: पोस्टर और बैनरों की अतिशय छपाई को कम किया जाए।
- दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम: जब सभाएँ, जुलूस और जलसे ख़त्म हों, तो सभी कार्यकर्ता अपने लगाए गए पोस्टर और बैनर पूरी तरह से हटाकर अपने घर ले जाएँ या उन्हें सम्मानजनक तरीके से रीसायकल (Recycle) करवाएँ।
अगर हम ऐसा कर पाए, तो न किसी ज़रूरतमंद को इसे अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल करना पड़ेगा, न सड़कों पर गंदगी फैलेगी, और न ही किसी अधिकारी को बेफिजूल की बातों में फँसकर अपना समय और मानसिक स्थिरता खोनी पड़ेगी।



