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कंबोडिया के ‘डिजिटल कैम्प’ में हिंसा: भारतीय, पाकिस्तानी और इंडोनेशियाई लोगों का शोषण के खिलाफ उग्र विद्रोह

शहर में स्थित चीनी-संचालित “काई बो स्कैम कंपाउंड” (Kai Bo Scam Compound) में बीती रात बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी। यह कोई सामान्य विरोध नहीं था; यह उन सैकड़ों भारतीय, पाकिस्तानी और इंडोनेशियाई मज़दूरों का उग्र विद्रोह था जिन्हें बेहतर नौकरियों का लालच देकर साइबर क्राइम की दुनिया में बंधक बना लिया गया था। शोषण की आग: वेतन, भेदभाव और विद्रोह काई बो पार्क, जिसे बाहर से “टेक जोन” बताया जाता है, असल में हजारों विदेशी नागरिकों के लिए एक जेल जैसा सायबर फ्रॉड हब है। इस विद्रोह के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण थे:

- वेतन का भुगतान न होना (Unpaid Wages): मज़दूरों को महीनों से उनका वेतन नहीं दिया गया था।
- धार्मिक भेदभाव: चीनी पर्यवेक्षकों द्वारा विशेष रूप से पाकिस्तानी और अन्य मुस्लिम श्रमिकों के साथ धार्मिक आधार पर अपमानजनक व्यवहार किया जा रहा था।
- मानवाधिकारों का हनन: पासपोर्ट ज़ब्त करना, कठोर निगरानी और भागने की कोशिश पर हिंसा।
सूत्रों के अनुसार, सैकड़ों विदेशी श्रमिकों ने मुख्य द्वार पर इकट्ठा होकर “Justice for Workers” और “Let Us Go Home” जैसे नारे लगाए। जब स्थानीय पुलिस स्थिति को संभालने पहुंची, तो भीड़ ने पीछे हटने के बजाय कंपनी के दफ़्तरों पर धावा बोल दिया, जमकर तोड़फोड़ की और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में प्रदर्शनकारियों द्वारा “Pakistan Rendahua” (पाकिस्तान ज़िंदाबाद / हम एक हैं) के नारे लगाए जाने की पुष्टि हुई है, जो इस विरोध में पाकिस्तानी मजदूरों की बड़ी भूमिका को दर्शाता है।
“काई बो”: आधुनिक डिजिटल गुलामी का केंद्र
काई बो जैसे परिसर अब दक्षिण-पूर्व एशिया में “आधुनिक डिजिटल गुलामी” (Modern Digital Slavery) के केंद्र बन चुके हैं। इन स्कैम कंपाउंड्स को चीनी कंपनियों द्वारा संचालित किया जाता है, जहाँ भोले-भाले युवाओं को ऑनलाइन निवेश धोखाधड़ी, फर्जी ट्रेडिंग और रोमांस स्कैम (जैसे ‘पिग-बुचरिंग’) जैसी गतिविधियों में जबरन लगाया जाता है।नागरिक जो यहाँ फँसे हैं: - भारतीय युवा: जिन्हें IT या डाटा एंट्री की आकर्षक नौकरियों का झांसा दिया गया।
- पाकिस्तानी श्रमिक: जो बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में आए और धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हुए।
- इंडोनेशियाई नागरिक: जो पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में साइबर क्राइम सिंडिकेट्स के मुख्य लक्ष्य रहे हैं।
यह घटना दर्शाती है कि शोषण की एक हद होती है, जिसके बाद दबे-कुचले लोग अपनी जान जोखिम में डालकर भी प्रतिरोध करते हैं।
राजनयिक संकट और आगे की राह
कंबोडिया के भीतर का यह विद्रोह अब एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संकट का रूप ले चुका है। - राजनयिक दबाव आवश्यक: यह विरोध प्रदर्शन अब भारत, पाकिस्तान और इंडोनेशिया की सरकारों पर कंबोडियाई प्रशासन से तत्काल और आधिकारिक कार्रवाई की मांग करने का भारी दबाव बनाएगा। पिछले साल भी सिहानोकविल में भारतीय मजदूरों के इसी तरह के विरोध के बाद भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप से कई लोगों को बचाया गया था।
- साइबर फ्रॉड के खिलाफ एकजुटता: यह स्पष्ट है कि साइबर अपराधियों के शिकार सिर्फ पश्चिमी देशों के लोग नहीं हैं; बल्कि एशियाई देशों के युवा भी हैं, जिन्हें गरीबी और बेरोजगारी का फायदा उठाकर साइबर क्राइम का औजार बनाया जा रहा है।
यदि इन “डिजिटल कैम्पों” को तुरंत बंद नहीं किया गया और फँसे हुए श्रमिकों को सुरक्षित वापस नहीं लाया गया, तो सिहानोकविल जैसे क्षेत्र मानव तस्करी और अपराध के एक ऐसे दलदल में बदल जाएंगे जहाँ से निकलना नामुमकिन होगा।



