जंगल ,पहाड़ और डायनासोर युग के15000 पेड़ काटकर किया जायेगा विकास??(NMDC लौह अयस्क खनन)

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में स्थित बैलाडीला की पहाड़ियाँ, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और अद्भुत जैव विविधता के लिए जानी जाती हैं, अब औद्योगिक विकास की भेंट चढ़ने वाली हैं। प्रकृति के अनमोल खजाने से भरी ये पहाड़ियाँ जल्द ही अपने मूल स्वरूप को खो सकती हैं।
राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (NMDC) अपने नए संयंत्र के विस्तार के लिए इस क्षेत्र के लगभग 15,000 पेड़ों को काटने की तैयारी में है। हालांकि, कंपनी ने सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा कर लिया है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी कीमत छिपि हुई है – इस अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश।
क्यों खास है बैलाडीला?
बैलाडीला सिर्फ़ पत्थरों का एक टीला नहीं, बल्कि प्रकृति का एक दुर्लभ उपहार है। इसे ‘छत्तीसगढ़ का चेरापूंजी’ भी कहा जाता है, जहाँ घने जंगल, कल-कल करती नदियाँ, और सैकड़ो तरह के अनोखे जीव-जंतु व वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। यहाँ की जैव विविधता इतनी समृद्ध है कि हर कुछ किलोमीटर पर शानदार झरने दिखाई देते हैं।

इस क्षेत्र में करोड़ों साल पुराने डायनासोर युग के दुर्लभ फर्न पौधे, जैसे Alsophila spinulosa और Alsophila gigantea, पाए जाते हैं। ये पौधे हजारों साल में एक पेड़ का रूप लेते हैं और कभी शाकाहारी डायनासोरों का भोजन हुआ करते थे। किरंदुल के पास स्थित हरी घाटी, जिसे 1859-60 में धोबी घाट के नाम से जाना जाता था, इन्हीं प्राचीन पौधों का घर है।
विकास और विनाश के बीच एक संतुलन की तलाश
NMDC 1960 के दशक से बैलाडीला के विशाल लौह अयस्क भंडारों का खनन कर रही है। यह लौह अयस्क भारत और जापान जैसे देशों को भेजा जाता है, जो देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
हालाँकि, यह विकास अब पर्यावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या हम विकास के नाम पर अपने प्राकृतिक विरासत को खोने के लिए तैयार हैं? बैलाडीला का यह विनाश सिर्फ़ पेड़ों के कटने का मामला नहीं है, बल्कि एक पूरी पारिस्थितिकी को हमेशा के लिए खत्म करने का मामला है।
यह खबर प्रकृति प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए गहरी चिंता का विषय है। क्या कोई रास्ता है जिससे हम इस अमूल्य खजाने को बचा सकें, या फिर विकास की यह अंधी दौड़ इसे पूरी तरह निगल जाएगी?



