सर्व आदिवासी समाज द्वारा बेटियों को पैतृक संपत्ति में 50% हिस्सेदारी का विरोध: सुप्रीम कोर्ट से अपना पक्ष रखने की सविनय मांग

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए आदिवासी बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर 50% हिस्सेदारी का हक दे दिया है। “राम चरण बनाम सुखराम” मामले में आया यह फैसला, संविधान में निहित समानता के अधिकार और सदियों पुरानी आदिवासी परंपराओं के बीच एक बड़ी बहस छेड़ गया है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का यह क्रांतिकारी फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी महिला के कानूनी वारिसों को उनके नाना की संपत्ति में हिस्सेदारी का अधिकार देते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि लैंगिक समानता केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इस फैसले के साथ, आदिवासी बेटियों को भी अब पैतृक संपत्ति में वो सम्मान और अधिकार मिलेगा जिसकी वे हमेशा से हकदार रही हैं। यह उन लाखों आदिवासी महिलाओं के लिए एक उम्मीद की किरण है जो अब तक अपनी ही जमीन पर बेगानी थीं।
आखिर क्यों हो रहा है इस फैसले का विरोध?
जहाँ एक ओर देश के प्रगतिशील वर्ग और महिला अधिकार संगठन इस फैसले का खुले दिल से स्वागत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ सहित कई आदिवासी बहुल राज्यों में इसका तीखा विरोध देखने को मिल रहा है। विरोध की अगुवाई कर रहे सर्व आदिवासी समाज और इसके प्रमुख नेता, जैसे पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम, इस फैसले को आदिवासी परंपराओं और रीति-रिवाजों पर “बाहरी हस्तक्षेप” करार दे रहे हैं।
विरोध के मुख्य कारण:
- परंपरा का हवाला: आदिवासियों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि उनकी पारंपरिक प्रथाएं, जिनमें संपत्ति का अधिकार पुरुषों तक सीमित रहा है, उनकी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग हैं।
- सामाजिक ताना-बाना बिगड़ने का डर: विरोध करने वालों को आशंका है कि बेटियों को संपत्ति में हिस्सा मिलने से परिवार और समुदाय के भीतर संपत्ति को लेकर विवाद बढ़ेंगे।
- “लव जिहाद” और जमीन हड़पने की आशंका: कुछ नेताओं ने यह चिंता भी जताई है कि इस फैसले से “लव जिहाद” के मामले बढ़ सकते हैं, जहाँ बाहरी व्यक्ति शादी के बहाने आदिवासी जमीन पर कब्जा करने की कोशिश कर सकते हैं।
- जमीन के विखंडन का भय: उन्हें डर है कि जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने से कृषि और आजीविका प्रभावित होगी।
सामाजिक कारण
यह विवाद केवल कानूनी नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों की जड़ें भी समेटे हुए है। भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक सोच, जो महिलाओं को संपत्ति से वंचित रखती है, इस विरोध की एक बड़ी वजह है।
लेकिन, संवैधानिक और न्यायसंगत दृष्टिकोण से, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह से सही है।
- संवैधानिक समानता: हमारा संविधान सभी को समान मानता है। लिंग के आधार पर संपत्ति के अधिकार से वंचित करना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
- महिलाओं का सशक्तिकरण: संपत्ति का अधिकार महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है, उनकी सामाजिक स्थिति मजबूत करता है और उन्हें निर्णय लेने की शक्ति देता है।
- न्याय, इक्विटी और विवेक: चूंकि आदिवासियों के लिए कोई विशिष्ट उत्तराधिकार कानून नहीं है, ऐसे में न्यायपालिका ने न्याय, इक्विटी और अच्छे विवेक के सिद्धांतों को लागू करते हुए लैंगिक भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया है।
आगे की राह: क्या परंपरा और प्रगति साथ चल सकते हैं?
यह फैसला आदिवासी समुदायों के लिए एक अग्निपरीक्षा है – एक तरफ अपनी सदियों पुरानी परंपराओं को बचाए रखने की चुनौती, तो दूसरी तरफ संवैधानिक मूल्यों और लैंगिक समानता की ओर बढ़ने की अनिवार्यता। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम भारत को एक अधिक समान और न्यायपूर्ण समाज बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
अब देखना यह होगा कि आदिवासी समाज इस फैसले को कैसे आत्मसात करता है और सरकार व सामाजिक संगठन इस बदलाव को जमीनी स्तर पर लागू करने में क्या भूमिका निभाते हैं। क्या आदिवासी समुदाय परंपरा और प्रगति के बीच एक सामंजस्य बिठा पाएंगे? यह सवाल आज हर किसी के मन में है।



