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कैथल में थानेदार को कोर्ट लॉकअप: मजबूरी या व्यवस्था की खामी?

कैथल कोर्ट का एक हालिया फैसला, जिसमें एक SHO को कोर्ट में गवाही के लिए पेश न होने पर लॉकअप में डाल दिया गया, पूरे पुलिस महकमे में हलचल मचा रहा है। जहाँ अदालत ने इसे न्याय की प्रक्रिया में एक गंभीर बाधा माना है, वहीं पुलिस विभाग इसे अपनी मजबूरियों से जोड़कर देख रहा है। यह घटना सिर्फ एक अधिकारी की लापरवाही नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की खामियों को भी उजागर करती है।
पुलिस की ड्यूटी का दबाव: कहाँ जाए थानेदार?
थानेदार यानी एक SHO का पद सिर्फ पुलिस स्टेशन चलाने तक सीमित नहीं होता। उनके कंधों पर अनगिनत जिम्मेदारियाँ होती हैं।

  • कानून-व्यवस्था: किसी भी शहर में अचानक होने वाले धरने, प्रदर्शन, वीआईपी मूवमेंट या भीड़ को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सीधे SHO की होती है। ऐसी आपातकालीन स्थितियों में कोर्ट की तारीख पर पहुँचना मुश्किल हो जाता है।
  • अपराध की जाँच: हर केस की डायरी बनाना, सबूत जुटाना और चार्जशीट तैयार करना एक जटिल और समय लेने वाला काम है, जो SHO को ही करना पड़ता है।
  • मीटिंग्स का अंबार: उन्हें अक्सर वरिष्ठ अधिकारियों की मीटिंग्स में शामिल होना पड़ता है, जिनसे अनुपस्थित रहना संभव नहीं है।
    इन तमाम जिम्मेदारियों के बीच कोर्ट में पेशी के लिए अधिकारियों से अनुमति लेने की लंबी प्रक्रिया भी अक्सर देरी का कारण बनती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या SHO अपनी ड्यूटी छोड़कर सिर्फ कोर्ट की तारीखों पर ध्यान दें?
    न्याय में देरी, न्याय से इनकार
    अदालत की अपनी मजबूरियाँ भी जायज हैं। न्यायालय मानता है कि अगर गवाह और खासकर SHO जैसे अहम अधिकारी समय पर न पहुँचें, तो केस की सुनवाई लटक जाती है। इसका सीधा असर पीड़ित और आरोपी दोनों पर पड़ता है। न्याय में देरी, न्याय से इनकार के बराबर मानी जाती है। एक SHO का कोर्ट की अवमानना करना पूरे न्याय तंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है। यह घटना दर्शाती है कि पुलिस और कोर्ट के बीच समन्वय की कितनी कमी है, जिसका खामियाजा दोनों को भुगतना पड़ता है।
    आगे का रास्ता: क्या हो समाधान?
    इस टकराव को खत्म करने के लिए कुछ व्यावहारिक समाधानों पर विचार किया जा सकता है।
  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग: पुलिस अधिकारियों को ड्यूटी के दौरान ही ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही देने की सुविधा दी जा सकती है। इससे उनका समय बचेगा और कोर्ट का काम भी नहीं रुकेगा।
  • पुलिस का विशेष सेल: पुलिस विभाग के भीतर एक विशेष सेल बनाई जाए, जो सिर्फ कोर्ट की तारीखों का प्रबंधन करे। यह सेल सुनिश्चित करे कि अधिकारी सही समय पर कोर्ट पहुँचें।
  • समन्वित शेड्यूल: कोर्ट और पुलिस विभाग आपस में मिलकर SHO की गवाही के लिए कुछ खास दिन तय कर सकते हैं, जिससे दोनों को सुविधा हो।
  • सरल अनुमति प्रक्रिया: SHO को हर बार लंबी परमिशन प्रक्रिया से न गुजरना पड़े।
    यह घटना दिखाती है कि एक तरफ न्याय का दबाव है और दूसरी तरफ पुलिस पर काम का बोझ। जरूरत है कि दोनों विभाग आपसी सहयोग से एक ऐसा रास्ता निकालें, जिससे न्याय भी हो और पुलिस अपनी ड्यूटी भी ठीक से कर सके। आखिर, दोनों का लक्ष्य एक ही है – जनता को न्याय दिलाना और कानून व्यवस्था बनाए रखना।
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