उच्च न्यायालय

विवाहित बेटी को माँ के लंबित मुआवजा मामले को आगे बढ़ाने का कानूनी अधिकार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत शादीशुदा बेटी उस लंबित मुआवजा दावे को आगे नहीं बढ़ा सकती, जो उसकी मां ने अपने पति की मौत के बाद दाखिल किया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 2(1)(डी) के तहत शादीशुदा बेटी को ‘आश्रित’ नहीं माना गया।

जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की पीठ ऐसे मामले की सुनवाई कर रही ,थी जिसमें कर्मचारी की विधवा ने अपने पति की कार्यस्थल पर हुई मौत के बाद मुआवजे का दावा किया। 26 अप्रैल 2015 को कारखाने की चारदीवारी गिरने से कर्मचारी की मौत हो गई थी। इस मामले में कर्मचारी की विधवा ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत दावा पेश किया।

दावे की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान विधवा की भी मौत हो गई। इसके बाद श्रम न्यायालय ने नियोक्ता की आपत्ति के बावजूद उनकी शादीशुदा बेटी को उनकी जगह पक्षकार बना दिया और उसके पक्ष में 6,12,360 रुपये का मुआवजा तथा 10 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश पारित किया।

नियोक्ता ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अधिनियम में ‘आश्रित’ की परिभाषा की जांच की। कोर्ट ने पाया कि धारा 2(1)(डी) में स्पष्ट रूप से ‘अविवाहित बेटी’ को आश्रित रिश्तेदार के रूप में शामिल किया गया है, जबकि शादीशुदा बेटी को इसमें शामिल नहीं किया गया।

जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने कहा,

“शादीशुदा बेटी को अधिनियम की धारा 2(1)(डी) के तहत आश्रित रिश्तेदार नहीं माना गया, क्योंकि इसमें केवल अविवाहित बेटी को शामिल किया गया।”

हाईकोर्ट ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि यदि मां के जीवनकाल में ही उनके पक्ष में मुआवजे का आदेश पारित हो गया होता तो वह राशि उनकी संपत्ति का हिस्सा बन जाती। ऐसी स्थिति में बेटी कानूनी प्रतिनिधि के रूप में उस राशि पर दावा कर सकती थी।

लेकिन मौजूदा मामले में मां की मौत मुआवजा आदेश पारित होने से पहले ही हो गई। इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि उनकी मौत के बाद दावा करने का अधिकार बेटी को नहीं मिला, क्योंकि वह कानून के तहत आश्रित नहीं थी।

कोर्ट ने कहा,

“मूल दावेदार की मृत्यु दावा कार्यवाही लंबित रहने के दौरान और कोई आदेश पारित होने से पहले हो गई। इसलिए दावे का कारण अपीलकर्ता के पक्ष में जीवित नहीं रहा, क्योंकि वह वर्ष 1923 के अधिनियम की धारा 2(1)(डी) के तहत आश्रित नहीं है।”

हाईकोर्ट ने श्रम न्यायालय के उस फैसले को गंभीर कानूनी त्रुटि माना, जिसके तहत शादीशुदा बेटी को मां की जगह पक्षकार बनाकर उसके पक्ष में मुआवजा मंजूर किया गया।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने नियोक्ता की अपील मंजूर कर ली जबकि मुआवजे में बढ़ोतरी और ब्याज की मांग करने वाली दावेदार की अपील खारिज की।

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