बिना धोखे या बेईमानी से उकसाए वैवाहिक स्थिति न बताना IPC की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक स्थिति से जुड़ी अहम जानकारी न बताने के सिर्फ़ आरोपों से – जब तक कि उसमें धोखा देने और बेईमानी से उकसाने जैसी ज़रूरी बातें शामिल न हों – IPC की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने कहा कि जिन अपराधों का आरोप लगाया गया, अगर उनके लिए ज़रूरी तत्व मौजूद नहीं हैं तो आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के 24 जुलाई, 2024 के उस आदेश को रद्द करने के लिए दायर की गई, जिसमें IPC की धारा 420 और 494 के तहत अपराध दर्ज करने का निर्देश दिया गया। याचिकाकर्ता और प्रतिवादी नंबर 2 ने शादी की थी, जबकि याचिकाकर्ता की पहले भी शादी हो चुकी थी और उस शादी के तलाक की कार्यवाही चल रही थी; बाद में फैमिली कोर्ट ने तलाक का आदेश (डिक्री) जारी किया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रतिवादी नंबर 2 को उसकी पिछली वैवाहिक स्थिति और चल रही कार्यवाही के बारे में पूरी जानकारी थी, इसलिए उसने कोई बात छिपाई नहीं, न ही कोई धोखा दिया और न ही बेईमानी से उकसाया।
कोर्ट ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष का मामला इस आधार पर आगे बढ़ा था कि प्रतिवादी नंबर 2 के साथ शादी के समय याचिकाकर्ता की पिछली शादी कायम थी और उसने यह बात छिपाई। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को धोखा देने और बेईमानी या धोखाधड़ी से उकसाने का ज़रूरी तत्व दिखाना होगा, जिसके परिणामस्वरूप संपत्ति सौंपी गई हो या किसी कीमती सिक्योरिटी (दस्तावेज़) में बदलाव किया गया हो या उसे नष्ट किया गया हो।
कोर्ट ने टिप्पणी की, “वैवाहिक स्थिति से जुड़ी अहम जानकारी न बताने का सिर्फ़ आरोप – जिसमें धोखा देने और बेईमानी से उकसाने जैसी ज़रूरी बातें शामिल न हों – अपने आप में IPC की धारा 420 के तहत अपराध नहीं बनता है।” कोर्ट ने ‘हृदय रंजन प्रसाद वर्मा बनाम बिहार राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में कहा गया कि धोखाधड़ी का मुख्य तत्व धोखा देना और बेईमानी से उकसाना है, और सिर्फ़ वादा तोड़ने या ज़िम्मेदारी पूरी न करने से धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता, जब तक कि शुरुआत से ही धोखाधड़ी या बेईमानी का इरादा न रहा हो। IPC की धारा 494 के मामले में कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि पहली वैध शादी अभी भी कायम है और बाद वाली शादी भी वैध तरीके से संपन्न हुई।
कोर्ट ने कहा, “…हमारी पक्की राय है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ IPC की धारा 420 और 494 के तहत अपराध के ज़रूरी तत्व नहीं बनते। इसलिए इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई फ़ायदा नहीं होगा और यह कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।” कोर्ट ने आगे कहा कि वैकल्पिक उपाय होने की दलील को इस कोर्ट के इनहेरेंट अधिकार क्षेत्र (Inherent Jurisdiction) के इस्तेमाल में पूरी तरह से रुकावट नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब कथित अपराधों के बुनियादी तत्व ही मौजूद न हों।




