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माताओं के हक में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ‘स्टाफ की कमी का बहाना बनाकर महिला कर्मचारियों का नहीं रोक सकते चाइल्ड केयर लीव’।जानिए पूरा मामला..

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला सरकारी कर्मचारियों के हित में एक बेहद अहम और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई महिला कर्मचारी नियम के तहत पात्रता रखती है, तो केवल ‘दफ्तर में स्टाफ की कमी’ या ‘प्रशासनिक असुविधा’ का हवाला देकर उसे चाइल्ड केयर लीव (Child Care Leave) देने से इनकार नहीं किया जा सकता।कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चों की देखभाल का अधिकार एक कानूनी और कल्याणकारी प्रावधान है, जिसे प्रशासनिक दलीलों की बलि नहीं चढ़ाया जा सकता।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला बिलासपुर सेंट्रल जेल में तैनात एक महिला वार्डन से जुड़ा है:

  • सितंबर 2025: महिला वार्डन ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया।
  • अप्रैल से जुलाई 2026: शुरुआत में महिला कर्मचारी को 13 अप्रैल 2026 से 11 जुलाई 2026 तक चाइल्ड केयर लीव दी गई।
  • 60 दिनों का विस्तार: बच्चों के छोटे होने और उन्हें लगातार मां की देखरेख की जरूरत को देखते हुए महिला वार्डन ने 60 दिन की छुट्टी बढ़ाने (Extension) की अर्जी दी।
  • अर्जी खारिज: जेल प्रशासन ने यह कहते हुए छुट्टी बढ़ाने से मना कर दिया कि सेंट्रल जेल में महिला वार्डनों की भारी कमी है और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
    इसके बाद पीड़ित महिला वार्डन ने अपने हक के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट में राज्य सरकार की दलील और आंकड़े

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश हलफनामे में बताया गया कि जेल में वार्डन के कुल 106 मंजूर पदों में से केवल 82 पद ही भरे हुए हैं। बिलासपुर सेंट्रल जेल में महज 13 महिला वार्डन तैनात हैं। सरकार की दलील थी कि सुरक्षा और स्टाफ की किल्लत के कारण छुट्टी न देना जायज कदम है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘प्रशासनिक इंतजाम करना सरकार का काम’

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस विभु दत्ता गुरु ने राज्य सरकार की इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा:

“कैडर में जगहें खाली हैं और महिला वार्डन की कमी है। हालांकि, सिर्फ इस तरह की प्रशासनिक मुश्किल के आधार पर छुट्टी के नियमों के तहत मिलने वाले कानूनी फायदे को रोका नहीं जा सकता। ‘चाइल्ड केयर लीव’ का मुख्य मकसद माताओं को उनके छोटे बच्चों की शुरुआती उम्र में उनकी सही देखभाल, सुरक्षा और ध्यान रखने में मदद करना है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • नियम 38-C की पात्रता: महिला कर्मचारी ने ‘छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (छुट्टी) नियम, 2010’ के तहत दी जाने वाली अधिकतम 730 दिनों की लीव लिमिट पूरी नहीं की थी और वह पूरी तरह पात्र थी।
  • नियोक्ता की जिम्मेदारी: पदों का खाली होना या स्टाफ का न होना एक प्रशासनिक विफलता हो सकती है, लेकिन इसकी सजा किसी कर्मचारी को उसका कानूनी अधिकार छीन कर नहीं दी जा सकती। स्टाफ का इंतजाम करना नियोक्ता (सरकार) की जिम्मेदारी है।

कोर्ट का अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन के छुट्टी खारिज करने वाले आदेश को ‘मनमाना और गैर-कानूनी’ ठहराते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि:

  1. महिला वार्डन की 60 दिनों की अतिरिक्त ‘चाइल्ड केयर लीव’ को तुरंत मंजूर किया जाए।
  2. अर्जी की तारीख से लेकर अब तक की अनुपस्थिति की अवधि को ‘चाइल्ड केयर लीव’ के रूप में दर्ज किया जाए।

क्यों खास है यह फैसला?

यह फैसला प्रदेश की हजारों महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए राहत की खबर है। अक्सर देखा जाता है कि वर्कलोड या स्टाफ की कमी का हवाला देकर महिला कर्मचारियों की चाइल्ड केयर लीव को टाल दिया जाता है या खारिज कर दिया जाता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक रुख से अब यह साफ हो गया है कि बच्चों की सही देखभाल का हक प्रशासनिक सहूलियत से कहीं ऊपर है।

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