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अब शिक्षक नहीं संभाल पाएंगे प्रशासनिक कुर्सी, व्याख्याताओं के BEO प्रभार पर लगी स्थायी रोक..जानिए क्या है मामला??

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग में सालों से चली आ रही ‘प्रभार संस्कृति’ पर एक ऐसा कानूनी चाबुक चलाया है, जिसकी गूंज पूरे प्रदेश के गलियारों में सुनाई दे रही है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाले ‘शिक्षक या व्याख्याता’ (टीचिंग कैडर) अब ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर बैठकर रौब नहीं झाड़ सकेंगे।
हाई कोर्ट के माननीय जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकल पीठ ने जांजगीर-चांपा जिले के प्रशासनिक अधिकारी रवि कुमार गौतम की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्कूल शिक्षा विभाग के 10 जून 2026 के उस विवादित आदेश को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया है, जिसके तहत नियमों को ताक पर रखकर एक व्याख्याता को बीईओ का प्रभार सौंप दिया गया था।

क्या था पूरा मामला? (विवाद की जड़)

मामला जांजगीर-चांपा जिले से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता रवि कुमार गौतम मूल रूप से प्रशासनिक संवर्ग (Administrative Cadre) के अधिकारी हैं और नियमों के तहत ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) के पद की योग्यता रखते हैं। लेकिन स्कूल शिक्षा विभाग ने स्थापित नियमों की अनदेखी करते हुए 10 जून 2026 को एक आदेश जारी किया। इस आदेश के जरिए प्रशासनिक अधिकारी के हक को दरकिनार कर, टीचिंग कैडर के एक व्याख्याता (लेक्चरर) को बीईओ का प्रभार सौंप दिया गया था।
विभाग के इस मनमाने रवैये और ‘पसंदीदा लोगों को मलाईदार पद’ बांटने की नीति के खिलाफ रवि कुमार गौतम ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी याचिका में विभाग के सेवा नियमों का हवाला देते हुए इस प्रभार को सीधे तौर पर अवैध चुनौती दी।

हाई कोर्ट ने किस कानून के तहत सुनाया फैसला?

हाई कोर्ट ने इस मामले की गहराई से समीक्षा की और पाया कि विभाग का आदेश पूरी तरह से नियम-विरुद्ध था। कोर्ट ने अपने फैसले में ‘छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षणिक एवं प्रशासनिक संवर्ग) भर्ती एवं पदोन्नति नियम’ का कड़ाई से हवाला दिया।
अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया:

  • संवर्ग का अंतर: बीईओ का पद पूर्णतः प्रशासनिक संवर्ग का हिस्सा है। इस पद पर 75% नियुक्तियां सहायक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (ABEO) या इसी संवर्ग के अधिकारियों की पदोन्नति (Promotion) से होनी चाहिए।
  • अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन: टीचिंग कैडर (शिक्षक संवर्ग) एक अलग व्यवस्था है। जब कोई शिक्षक प्रशासनिक संवर्ग का हिस्सा ही नहीं है, तो उसे प्रशासनिक कुर्सी पर बैठाना सीधे तौर पर भर्ती नियमों का उल्लंघन और अवैध है।

विश्लेषण: इस फैसले के क्या होंगे दूरगामी असर?

हाई कोर्ट का यह फैसला छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में एक बड़े प्रशासनिक सुधार की नींव साबित होगा। इसके मुख्य रूप से तीन बड़े असर देखने को मिलेंगे:

1. ‘प्रभार और जुगाड़’ संस्कृति का अंत: प्रदेश में सालों से यह खेल चल रहा था कि रसूखदार शिक्षक या व्याख्याता जुगाड़ लगाकर मलाईदार प्रशासनिक पदों (BEO) पर बैठ जाते थे। इस फैसले के बाद अब यह ‘शॉर्टकट’ पूरी तरह बंद हो जाएगा।
2. प्रशासनिक अधिकारियों को मिलेगा हक: प्रशासनिक संवर्ग के जो अधिकारी (जैसे ABEO) सालों से अपनी पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं, उनके लिए तरक्की के रास्ते साफ होंगे। उनके पदों पर अब कोई दूसरा कब्जा नहीं कर पाएगा।
3. शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार: व्याख्याताओं और शिक्षकों का मूल काम बच्चों को पढ़ाना और उनका भविष्य संवारना है। जब वे प्रशासनिक कार्य और दफ्तरी बाबूगीरी से मुक्त रहेंगे, तो उनका पूरा ध्यान स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने में लगेगा।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रवि कुमार गौतम की याचिका पर यह ऐतिहासिक निर्णय देकर शिक्षा विभाग को यह कड़ा संदेश दे दिया है कि ‘जिसका काम, उसी को साजे’। अब देखना यह होगा कि हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद स्कूल शिक्षा विभाग पूरे प्रदेश में अवैध रूप से जमे बैठे अन्य ‘प्रभारी बीईओ’ को हटाने के लिए कितनी जल्दी कदम उठाता है।

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