कृषक उन्नति योजना !! जानिए छत्तीसगढ़ सरकार का बड़ा फैसला..

कृषि सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि धरती और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने का विज्ञान है। छत्तीसगढ़ सरकार ने ‘कृषक उन्नति योजना’ के तहत एक ऐसा वैज्ञानिक और दूरदर्शी फैसला लिया है, जो राज्य की खेती की तस्वीर बदल सकता है। सरकार धान के बदले दूसरी फसलें उगाने वाले किसानों को 15, हजार रुपए प्रति एकड़ और दलहन-तिलहन या मिलेट्स (मोटे अनाज) उगाने वालों को 10 हजार रुपए प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि दे रही है।
लेकिन क्या आपने सोचा है कि सरकार धान को छोड़कर दूसरी फसलों पर इतना जोर क्यों दे रही है? इसके पीछे छिपा है एक गहरा वैज्ञानिक और पर्यावरणीय सच।
एक ही फसल उगाने का वैज्ञानिक नुकसान: ‘मोनोकल्चर’ का खतरा
जब हम साल-दर-साल एक ही जमीन पर सिर्फ धान उगाते हैं, तो विज्ञान की भाषा में इसे ‘मोनोकल्चर’ कहा जाता है। लगातार धान उगाने से जमीन के एक खास तरह के पोषक तत्व पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। धान के खेतों में महीनों पानी जमा रहता है, जिससे मिट्टी में ऑक्सीजन का प्रवाह रुक जाता है और मित्र बैक्टीरिया मरने लगते हैं। इसके अलावा, जमा पानी से मीथेन (CH₄) जैसी खतरनाक ग्रीनहाउस गैस निकलती है, जो ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाती है।
फसल विविधीकरण (Crop Diversification): प्रकृति का सुरक्षा कवच
जब किसान धान के बदले दलहन (दालें), तिलहन या मिलेट्स उगाते हैं, तो वे असल में प्रकृति की मदद कर रहे होते हैं:
- मिट्टी की खुद की ‘खाद फैक्ट्री’: अरहर, उड़द और मूंग जैसी दलहनी फसलों की जड़ों में एक विशेष बैक्टीरिया (राइजोबियम) पाया जाता है। यह हवा से नाइट्रोजन लेकर सीधे मिट्टी में फिक्स कर देता है। यानी रासायनिक यूरिया की जरूरत अपने आप कम हो जाती है।
- पानी की भारी बचत: एक किलो धान उगाने में लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी बर्बाद होता है। इसके विपरीत मक्का, रागी, कोदो और कुटकी जैसी फसलें बहुत कम पानी में, यहाँ तक कि सूखे की स्थिति में भी शानदार उत्पादन देती हैं। ये ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ फसलें हैं।
- भविष्य का सुपरफूड (मिलेट्स): कोदो, कुटकी और रागी जैसे मोटे अनाज पोषक तत्वों के पावरहाउस हैं। इनमें भरपूर कैल्शियम, आयरन और फाइबर होता है, जो आज की पीढ़ी को कुपोषण और डायबिटीज जैसी बीमारियों से बचाता है।
कैसे उठाएं योजना का वैज्ञानिक लाभ?
इस योजना का लाभ उठाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल तकनीक पर आधारित है:
- सटीक सत्यापन: योजना का लाभ केवल उन्हीं किसानों को मिलेगा जो एकीकृत किसान पोर्टल पर पंजीकृत हैं। भुगतान ‘डिजिटल क्रॉप सर्वे’ (गिरदावरी) के माध्यम से भूमि क्षेत्र (रकबे) की वैज्ञानिक पुष्टि के बाद ही किया जाएगा।
- सफलता का प्रमाण: यह प्रयोग कितना सफल है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष 2025 में अकेले सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में 144 किसानों ने धान का विकल्प चुना और उन्हें 13 लाख रुपए मिले। वहीं 10,408 दलहन-तिलहन उत्पादक किसानों के खातों में 2 करोड़ 91 लाख रुपए ट्रांसफर किए गए।
उप संचालक कृषि की अपील
कृषि विशेषज्ञों और सारंगढ़-बिलाईगढ़ के उप संचालक कृषि ने किसानों से अपील की है कि वे समय बर्बाद किए बिना अपने ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी या समिति प्रबंधक से संपर्क करें। नए पंजीयन या कैरी फॉरवर्ड के समय ‘धान के बदले अन्य फसल’ का विकल्प चुनें।
उप संचालक कृषि (सारंगढ़-बिलाईगढ़) :- बदलती जलवायु के इस दौर में पानी की हर बूंद कीमती है। धान के मोह से बाहर निकलकर दलहन, तिलहन और मिलेट्स को अपनाना सिर्फ आर्थिक रूप से बुद्धिमानी नहीं है, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी और उपजाऊ मिट्टी को सुरक्षित रखने का एक पवित्र संकल्प भी है। आइए, छत्तीसगढ़ को समृद्ध और पर्यावरण-अनुकूल बनाएं!




