गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी बनी ‘ट्रेंडसेटर’: जी-20 की तर्ज पर बदला डिग्रियों का प्रारूप, क्या बाकी विश्वविद्यालय भी चलेंगे इसी राह?

क्या आने वाले समय में देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों की डिग्रियों से ‘India’ शब्द गायब हो जाएगा? छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) के एक हालिया फैसले ने इस बहस को एक बार फिर हवा दे दी है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने निर्णय लिया है कि अब छात्रों को दी जाने वाली डिग्री और मार्कशीट में अंग्रेजी के ‘India’ शब्द को हटाकर उसकी जगह ‘Bharat’ लिखा जाएगा।
यह केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी वैचारिक और सांस्कृतिक सोच काम कर रही है। आइए समझते हैं कि इस फैसले के मायने क्या हैं और यह शिक्षा जगत में किस तरह की नई चर्चा को जन्म दे रहा है।
फैसला क्या है और कब से होगा लागू?
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय की स्टैंडिंग कमेटी ने करीब छह महीने पहले ही इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। वर्तमान में यूनिवर्सिटी के पास डिग्री और मार्कशीट का जो पुराना स्टॉक (स्टेशनरी) बचा हुआ है, उसके खत्म होते ही यह नया नियम पूरी तरह लागू हो जाएगा।
अब तक की व्यवस्था के अनुसार, मार्कशीट में हिंदी वाले हिस्से में ‘भारत’ और अंग्रेजी वाले हिस्से में ‘India’ लिखा जाता था। लेकिन अब नए प्रारूप में अंग्रेजी टेक्स्ट में भी “Central University of Bharat” या इससे मिलता-जुलता प्रारूप दिखाई देगा।
कुलपति की दलील: “गुलामी की मानसिकता से मुक्ति”
विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice Chancellor) आलोक कुमार चक्रवाल ने इस फैसले के पीछे बेहद स्पष्ट तर्क दिए हैं। उनका मानना है कि:
- सांस्कृतिक जड़ें: हमारे इतिहास, पुराणों और संस्कृति में इस भूमि को हमेशा ‘भारत’ या ‘आर्यावर्त’ कहा गया है। ‘इण्डिया’ नाम विदेशियों (औपनिवेशिक ताकतों) द्वारा अपनी सुविधा के लिए दिया गया था।
- संवैधानिक मिसाल: कुलपति ने साल 2023 के जी-20 (G20) शिखर सम्मेलन का हवाला दिया, जहाँ राष्ट्रपति भवन से जारी आधिकारिक डिनर इनविटेशन पर ‘President of India’ की जगह ‘President of Bharat’ लिखा गया था। जब देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद इस दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो शैक्षणिक संस्थानों को भी अपनी पहचान पर गर्व होना चाहिए।
समीक्षा: क्या यह बदलाव एक नई राह दिखाएगा?
इस फैसले को व्यापक नजरिए से देखें तो यह केंद्र सरकार के ‘डी-कोलोनाइजेशन’ (औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति) के एजेंडे से पूरी तरह मेल खाता है। शिक्षा नीति (NEP 2020) भी भारतीयता और क्षेत्रीय गौरव पर जोर देती है।
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है:
जहाँ एक तरफ इस फैसले की सराहना इस बात के लिए हो रही है कि यह देश की मूल पहचान को बढ़ावा देता है, वहीं दूसरी तरफ कुछ जानकार इसे केवल एक ‘प्रतीकात्मक’ (Symbolic) बदलाव मान रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि यूनिवर्सिटीज का मुख्य ध्यान वैश्विक रैंकिंग, शोध (Research) की गुणवत्ता और छात्रों के प्लेसमेंट को सुधारने पर होना चाहिए, न कि दस्तावेजों के नाम बदलने पर।
क्या छत्तीसगढ़ की बाकी यूनिवर्सिटीज भी राह पकड़ेंगी?
फिलहाल, राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय और बिलासपुर के ही अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के अधिकारियों का कहना है कि उनके पास शासन की तरफ से ऐसा कोई निर्देश नहीं है और वे मौजूदा व्यवस्था के तहत ही काम कर रहे हैं।
चूँकि गुरु घासीदास विश्वविद्यालय एक केंद्रीय विश्वविद्यालय (Central University) है, इसलिए इसके इस कदम को देश की अन्य सेंट्रल यूनिवर्सिटीज के लिए एक ‘ट्रेंडसेटर’ के रूप में देखा जा रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या आने वाले दिनों में देश के अन्य बड़े संस्थान भी अपनी डिग्रियों का ‘स्वदेशीकरण’ करते हैं या नहीं।



