
हमारे समाज में आज भी मासिक धर्म (पीरियड्स) एक ऐसा विषय है, जिस पर बात करने में लोग हिचकिचाते हैं। सदियों पुरानी रूढ़िवादी भ्रांतियां और अज्ञानता आज भी महिलाओं के स्वास्थ्य और उनकी सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में इस चुप्पी को तोड़ने के लिए एक बेहद सराहनीय और ऐतिहासिक कदम उठाया गया है।
बिलासपुर जिला पुलिस और बस्ता एजुकेशन एण्ड हेल्थ फाउंडेशन के ‘प्रोजेक्ट आरुग’ के संयुक्त तत्वावधान में पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों के लिए एक विशेष जागरूकता कार्यशाला का आयोजन किया गया। चेतना हॉल, रक्षित केंद्र बिलासपुर में आयोजित इस कार्यशाला का मुख्य संदेश था— “पुरुष हो या नारी, अब होगी हर किसी को माहवारी की जानकारी।”
जब खाकी ने रूढ़ियों को दी चुनौती
बिलासपुर पुलिस लाइन में जनरल परेड के बाद चेतना हॉल में एक अलग ही नजारा देखने को मिला। अमूमन अपराध और कानून व्यवस्था पर चर्चा करने वाले पुलिस अधिकारी और कर्मचारी वहां समाज की सबसे बड़ी वर्जनाओं में से एक—मासिक धर्म—पर खुलकर बात कर रहे थे।
कार्यशाला में इस बात पर गहरा मंथन हुआ कि पीढ़ियों से चली आ रही गलत धारणाओं के कारण आज भी हमारी बेटियां और महिलाएं झिझक, डर और अज्ञानता के साए में जीने को मजबूर हैं। मासिक धर्म कोई बीमारी या अपवित्रता नहीं है, बल्कि यह प्रकृति का एक सामान्य और बेहद जरूरी हिस्सा है।

क्या है ‘प्रोजेक्ट आरुग’? छत्तीसगढ़ी शब्द के पीछे छिपी वैज्ञानिक सोच
इस अभियान की मुख्य सूत्रधार और सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री विनिता पटेल पिछले 6 वर्षों से इस दिशा में जमीनी स्तर पर काम कर रही हैं। एक छोटे से गांव (जिला रायगढ़) से निकलकर समाज में व्याप्त इस चुप्पी को तोड़ने वाली विनिता पटेल ने अब तक लगभग 15 हजार से अधिक महिलाओं/किशोरियों और 1 हजार से अधिक पुरुषों व बालकों को इस विषय पर जागरूक किया है।
कार्यशाला में उन्होंने बेहद सरल और सहज शब्दों में अपनी कहानियां और अनुभव साझा करते हुए बताया:
- ‘आरुग’ का असली अर्थ: छत्तीसगढ़ी भाषा में ‘आरुग’ शब्द का अर्थ होता है ‘पवित्र’। इस प्रोजेक्ट का नाम आरुग इसीलिए रखा गया है ताकि माहवारी को अपवित्र मानने वाली सदियों पुरानी भ्रांतियों को जड़ से खत्म किया जा सके और समाज में एक वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिले।
- हार्मोनल प्रक्रिया और संवेदनशीलता: उन्होंने समझाया कि माहवारी पूरी तरह से एक प्रकृति प्रदत्त शारीरिक प्रक्रिया है जो महिलाओं में हार्मोनल बदलावों के कारण हर महीने होती है।
- पुरुषों की भूमिका: इस समय होने वाले शारीरिक कष्टों और मानसिक उतार-चढ़ाव के दौरान परिवार के हर पुरुष सदस्य (चाहे वह मां का बेटा हो, पत्नी का पति हो, या बहन का भाई) को बेहद संवेदनशीलता के साथ महिलाओं का सहयोग करना चाहिए। साथ ही उनके उचित खान-पान और पोषण का ध्यान रखना भी जरूरी है।
SSP ने कहा: “अज्ञानता के कारण बढ़ती हैं महिला हिंसा की घटनाएं”
इस कार्यशाला में मुख्य रूप से उपस्थित उप पुलिस महानिरीक्षक एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (/SSP) श्री रजनेश सिंह (IPS) ने समाज और परिवार के पुरुषों को इस मुहिम से जोड़ने पर सबसे ज्यादा जोर दिया।
श्री रजनेश सिंह ने अपने संबोधन में बेहद गंभीर और जरूरी बातें कहीं:
- लड़कों को भी मिले सही ज्ञान: उन्होंने कहा कि घर के लड़कों और पुरुष सदस्यों को इसके संबंध में सही और सटीक जानकारी होना बेहद आवश्यक है।
- अपराधों में आएगी कमी: परिवारों और स्कूलों में बच्चों को मासिक धर्म के संबंध में सही वैज्ञानिक ज्ञान देना बेहद जरूरी है। अज्ञानता और अधूरी जानकारी के कारण बच्चों में इसे जानने की गलत जिज्ञासा पैदा होती है, जो कई बार महिलाओं और बालिकाओं के साथ होने वाली हिंसा व आपराधिक घटनाओं की वजह बनती है। अगर समाज का हर व्यक्ति जागरूक होगा, तो ऐसी अप्रिय घटनाओं को रोकने में बड़ी मदद मिलेगी।
खाकी ने ली शपथ: अब पुलिसकर्मी बनेंगे ‘आरुग वीर’
कार्यक्रम के समापन पर बिलासपुर पुलिस के आला अधिकारियों और कर्मचारियों ने समाज में मासिक धर्म के प्रति फैली भ्रांतियों को दूर करने और महिलाओं का सम्मान व मदद करने का संकल्प लिया। एसएसपी श्री रजनेश सिंह (IPS) द्वारा सभी अधिकारी-कर्मचारियों को ‘आरुग वीर’ बनकर अपने परिवार और समाज में सक्रिय भूमिका निभाने की शपथ दिलाई गई।
कार्यशाला में उपस्थित रहे प्रमुख अधिकारी:
इस बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण कार्यशाला में पुलिस विभाग के लगभग 190 अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:
- श्री पंकज कुमार पटेल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (शहर)
- श्री रामगोपाल करियारे, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (यातायात)
- श्री गगन कुमार नगर, पुलिस अधीक्षक कोतवाली
- श्री निमितेश सिंह, नगर पुलिस अधीक्षक सिविल लाइन
- श्रीमती मंजुलता केरकेट्टा, उप पुलिस अधीक्षक पुलिस लाइन/मुख्यालय
- सुश्री अनीता प्रभा मिंज, उप पुलिस अधीक्षक (आईयूसीएडब्ल्यू)
क्यों जरूरी है यह पहल?
बिलासपुर पुलिस और प्रोजेक्ट आरुग की यह संयुक्त पहल केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत है। जब कानून के रखवाले खुद आगे बढ़कर ऐसी वर्जनाओं पर बात करते हैं, तो समाज में एक बेहद सकारात्मक और मजबूत संदेश जाता है। उम्मीद है कि खाकी की यह ‘आरुग वीर’ मुहिम छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल बनेगी।




