
एक तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री जनता से अपील कर रहे हैं कि पेट्रोल-डीजल का उपयोग कम करें और सोने की खरीदारी घटाएं ताकि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो सके। लेकिन दूसरी तरफ, सरकारी विभागों की बैलेंस शीट एक अलग ही कहानी बयां कर रही है। क्या ‘बचत’ का यह पाठ केवल आम नागरिक के लिए है, या वीआईपी कल्चर की चकाचौंध में डूबे अफसरों और नेताओं पर भी कोई लगाम लगेगी?
आंकड़ों का ‘खर्च-नामा’: जनता की जेब और सरकारी शौक
हाल ही में विधानसभा में प्रस्तुत आधिकारिक दस्तावेज़ चौंकाने वाले हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस ने केवल एक साल के भीतर किराए की गाड़ियों पर 130 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च कर दी है। यदि इसमें सरकारी और निजी वाहनों के डीजल और मरम्मत का खर्च भी जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा लगभग 350 करोड़ रुपये के करीब पहुंच जाता है।
खर्च का गणित:
- किराए की गाड़ियाँ: ₹1,30,03,20,413.00 (चालू वित्तीय वर्ष 16.02.2026 तक)।
- सर्वाधिक खर्च वाले क्षेत्र: रायपुर (संयुक्त) में 6,600 से अधिक वाहनों पर ₹15.51 करोड़ और बीजापुर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में ₹26.30 करोड़ से अधिक की राशि केवल किराए पर फूंकी गई।
एक तरफ ‘ड्राई’ पंप, दूसरी तरफ ‘फ्री’ का टिफिन
जहाँ कोंडागांव जैसे जिलों में पेट्रोल-डीजल पंप ‘ड्राई’ हो चुके हैं और जनता बूंद-बूंंद तेल के लिए कतारों में खड़ी है, वहीं प्रशासनिक गलियारों में ‘अटैच्ड’ गाड़ियों का खेल बदस्तूर जारी है। शिकायतें आम हैं कि कई बड़े अधिकारियों के पास एक से अधिक सरकारी गाड़ियाँ हैं। विडंबना देखिए कि जिन गाड़ियों का इस्तेमाल अपराध रोकने या जनसेवा के लिए होना चाहिए, वे अक्सर साहब का टिफिन लाने, परिवार को घुमाने या बच्चों को स्कूल छोड़ने में व्यस्त दिखाई देती हैं।
वीआईपी कल्चर का ‘काफिला’ और नैतिकता का सवाल
मंत्रियों और रसूखदार नेताओं के दौरों में गाड़ियों का लंबा काफिला सुरक्षा के नाम पर चलता है, लेकिन इसमें होने वाला तेल का खर्च सीधे तौर पर राजकोष पर बोझ है। मुख्यमंत्री की अपील सराहनीय हो सकती है, लेकिन इसका असर तब दिखेगा जब इसकी शुरुआत सत्ता के गलियारों से होगी।
क्या यह न्यायसंगत है?
- जनता से तेल बचाने की अपील, और विभागों में करोड़ों का धुआं?
- आम आदमी के लिए महंगाई की मार, और अफसरों के लिए लग्जरी गाड़ियाँ?
- कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में संसाधनों की कमी, और राजधानी में गाड़ियों की फौज?
अनुसरण से ही आएगा सुधार
लोकतंत्र में ‘मितव्ययता’ का उपदेश तभी सफल होता है जब नेतृत्व स्वयं उसका अनुसरण करे। यदि सरकार वास्तव में पेट्रोल-डीजल की खपत कम करना चाहती है, तो उसे सबसे पहले अपने ‘वाहन बेड़े’ का ऑडिट करना होगा। फिजूलखर्ची पर रोक और जवाबदेही तय किए बिना जनता को दी गई नसीहतें केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएंगी।
अब समय आ गया है कि जनता यह पूछे: “साहब, तेल हम बचाएं और टिफिन आपकी सरकारी गाड़ी लाए… क्या यही सुशासन है?”



