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हसदेव पर फिर ‘हथौड़ा’: तीसरी मंजूरी से 7 लाख पेड़ों पर संकट, अडानी की नई ‘मनमानी’ मांग ने बढ़ाई साय सरकार की बेचैनी

छत्तीसगढ़ का ‘हसदेव अरण्य’—जिसे मध्य भारत का फेफड़ा कहा जाता है—एक बार फिर कॉर्पोरेट हितों और पर्यावरण संरक्षण की जंग का अखाड़ा बन गया है। एक तरफ जहां हसदेव के जंगलों में तीसरी खदान को हरी झंडी मिल गई है, वहीं दूसरी ओर अडानी समूह की नई मांगों ने राज्य की विष्णुदेव साय सरकार को धर्मसंकट में डाल दिया है।

तीसरी मंजूरी: रेगिस्तान बनने की राह पर छत्तीसगढ़?

राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को आवंटित ‘केते एक्सटेंशन’ (Kete Extension) कोयला ब्लॉक को तीसरी मंजूरी मिलना हसदेव के लिए किसी ‘डेथ वारंट’ से कम नहीं माना जा रहा है।

  • विनाश का गणित: जानकारों और स्थानीय संघर्ष समिति का दावा है कि इस मंजूरी के बाद करीब 1762 हेक्टेयर जमीन पर खनन होगा, जिसमें से 98% हिस्सा सघन वन है।
  • 7 लाख पेड़ों की बलि: सरकारी आंकड़े भले ही कम बताएं, लेकिन जमीन पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस फैसले से 7 लाख से अधिक पेड़ काट दिए जाएंगे।
  • अस्तित्व पर खतरा: भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यहाँ खनन से ‘मिनी माता हसदेव बांगो बांध’ और हसदेव नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

अडानी की नई मांग: क्या अब सरगुजा की बारी है?

वीडियो रिपोर्ट्स और सूत्रों के अनुसार, अडानी पावर लिमिटेड और अडानी एंटरप्राइजेस ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर सरगुजा क्षेत्र में नई परियोजनाओं के लिए जमीन मांगी है।

  • बस्तर से मोहभंग?: गौरतलब है कि अडानी को बस्तर में भी एक लौह अयस्क खदान मिली थी, लेकिन वहां 150 गांवों के आदिवासियों के कड़े विरोध के कारण 8 महीने बाद भी काम शुरू नहीं हो सका है। शायद यही वजह है कि अब उनकी नजर सरगुजा की जमीन पर है।
  • सरकार की दुविधा: साय सरकार एक ओर उद्योगपतियों को आमंत्रित कर रही है, वहीं दूसरी ओर अडानी की इस ‘विशिष्ट’ मांग ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। क्या सरकार आदिवासियों के हितों की बलि देकर कॉर्पोरेट को खुश करेगी?

बड़ा सवाल: जब कोयले की जरूरत नहीं, तो जंगल क्यों कट रहे?

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि राजस्थान, जिसके नाम पर ये खदानें आवंटित हैं, वहां बिजली की मांग और उत्पादन के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

  • सरप्लस बिजली: सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के संशोधित आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में सौर ऊर्जा के विस्तार के बाद आने वाले वर्षों में बिजली की कमी नहीं, बल्कि सरप्लस (बढ़त) होगी।
  • निजी फायदा?: आरोप लग रहे हैं कि यह पूरा खेल राजस्थान की बिजली के लिए नहीं, बल्कि अडानी के अपने निजी पावर प्लांटों को सस्ता कोयला पहुंचाने के लिए रचा जा रहा है।

हाथी-मानव द्वंद्व और विलुप्त होती जैव-विविधता

हसदेव केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि हाथियों का एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर है। जंगल कटने से हाथियों का प्राकृतिक रहवास खत्म हो रहा है, जिससे वे बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे न केवल जन-हानि हो रही है, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध जैव-विविधता और दुर्लभ औषधीय पौधे भी हमेशा के लिए खत्म हो रहे हैं।

जागरूक होने का वक्त

आज छत्तीसगढ़ तप रहा है। दुनिया के सबसे गर्म शहरों की सूची में प्रदेश के शहर शामिल हो रहे हैं। अगर हसदेव के इन जंगलों को नहीं बचाया गया, तो छत्तीसगढ़ को ‘रेगिस्तान’ बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। यह मुद्दा केवल सरगुजा या आदिवासियों का नहीं है, बल्कि हर उस नागरिक का है जो साफ हवा और पानी की उम्मीद रखता है।
सवाल अब सरकार से है: क्या दिल्ली के दबाव और कॉर्पोरेट प्रेम के आगे छत्तीसगढ़ की ‘सांसें’ गिरवी रख दी जाएंगी?

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