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भीषण गर्मी में अब ‘मटका पद्धति’ से बचेंगे पौधे, पानी की बर्बादी में 70% तक की कमी!( देखिए शानदार वीडियो)

(बालोद जिला प्रशासन की अनूठी पहल)

बालोद। छत्तीसगढ़ में पारा चढ़ते ही इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षी और पेड़-पौधों के लिए भी संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे में बालोद जिला प्रशासन ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा पूरे प्रदेश में हो रही है। बालोद कलेक्टरेट परिसर को ‘ग्रीन ज़ोन’ बनाए रखने के लिए प्रशासन ने पारंपरिक और वैज्ञानिक तरीकों का बेहतरीन तालमेल बिठाते हुए ‘मटका सिंचाई पद्धति’ को अपनाया है।

क्या है यह अनूठी पहल?

भीषण गर्मी में छोटे पौधों को सूखने से बचाने के लिए प्रशासन ने कलेक्टरेट परिसर में लगे हजारों पौधों के समीप मिट्टी के छोटे मटके जमीन में दबाए हैं। इन मटकों को एक बार पानी से भरने पर लगभग एक सप्ताह तक पानी धीरे-धीरे रिसता रहता है, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है।

इस तकनीक के 3 बड़े फायदे:

  1. 70% पानी की बचत: इस विधि से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचता है, जिससे पानी की बर्बादी रुकती है और सामान्य सिंचाई के मुकाबले 70% तक पानी कम खर्च होता है।
  2. पौधों का सुरक्षा कवच: तेज धूप और लू के बावजूद पौधों को हफ्ते भर तक निरंतर नमी मिलती रहती है, जिससे उनके सूखने का खतरा खत्म हो गया है।
  3. स्थानीय कला का सम्मान: इस पहल के लिए स्थानीय कुम्हारों से मटके खरीदे गए हैं, जिससे उनकी कला को सम्मान और रोजगार दोनों मिल रहा है।

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को मिली नई ताकत

कलेक्टरेट परिसर में मुख्यमंत्री और अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा लगाए गए पौधों (जैसे ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत रोपित पौधे) की सुरक्षा के लिए भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह न केवल जल संरक्षण का संदेश दे रहा है, बल्कि पर्यावरण के प्रति जिला प्रशासन की गंभीरता को भी दर्शाता है।

आम नागरिक भी उठा सकते हैं लाभ

जिला प्रशासन की यह पहल हम सभी के लिए एक सीख है। यदि हम भी अपने घरों, बगीचों या सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए पौधों के पास इसी तरह पुराने या छोटे मटकों का उपयोग करें, तो कम पानी में भी हम हरियाली को सुरक्षित रख सकते हैं।

“बालोद प्रशासन का यह कदम यह साबित करता है कि संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि सही विचार और इच्छाशक्ति से पर्यावरण को बचाया जा सकता है।”

जहाँ एक ओर जल स्तर गिर रहा है, वहीं बालोद प्रशासन की यह “मटका क्रांति” आने वाले समय में अन्य जिलों के लिए भी एक रोल मॉडल साबित हो सकती है। अब बारी हमारी है कि हम भी अपनी धरा को हरा-भरा रखने के लिए ऐसे छोटे लेकिन प्रभावी कदम उठाएं।

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