छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का एक छोटा सा क्षेत्र ‘लैलूंगा’ आज अपनी एक खास खुशबू से देशभर को महका रहा है। यह खुशबू है ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल की, जो अब केवल स्थानीय थालियों तक सीमित नहीं है, बल्कि बेंगलुरु के आईटी हब से लेकर कारगिल की बर्फीली चोटियों तक अपनी पहुंच बना चुका है।
यहाँ इस विशेष चावल और इसके पीछे की सफलता की पूरी कहानी दी गई है, जो न केवल किसानों के लिए प्रेरणा है, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक पाठकों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
विशिष्ट जलवायु और प्राकृतिक मिठास
जंवाफूल चावल की सबसे बड़ी खूबी इसकी प्राकृतिक सुगंध और स्वाद है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, लैलूंगा की भौगोलिक स्थिति इस किस्म के लिए वरदान है। यहाँ दिन की पर्याप्त गर्मी और रात की हल्की ठंडक का जो तालमेल है, वही इस धान में विशेष खुशबू पैदा करता है। यह एक ऐसी विशेषता है जो किसी कृत्रिम खाद से नहीं, बल्कि प्रकृति की देन है।
शुद्धता का पैमाना: पूरी तरह जैविक खेती
आज के दौर में जब रसायन मुक्त भोजन की मांग बढ़ रही है, लैलूंगा के किसान पूरी तरह जैविक पद्धति को अपना रहे हैं। यहाँ किसान रासायनिक खाद या कीटनाशकों के बजाय ‘हरी खाद’ का उपयोग करते हैं। इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, बल्कि चावल की गुणवत्ता और स्वास्थ्य लाभ भी बरकरार रहते हैं। यही कारण है कि जागरूक उपभोक्ताओं के बीच इसकी विश्वसनीयता अटूट है।
किसानों की समृद्धि का नया आधार
एक समय था जब किसान पारंपरिक धान की खेती तक सीमित थे, लेकिन ‘केलो’ जंवाफूल ने उनकी किस्मत बदल दी है। आंकड़ों और किसानों के अनुभव के आधार पर इसके आर्थिक लाभ को इस प्रकार समझा जा सकता है:

- बेहतर बाजार मूल्य: जहाँ सामान्य धान की कीमतें सीमित होती हैं, वहीं जैविक जंवाफूल का बाजार मूल्य लगभग 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है।
- कम लागत, अधिक मुनाफा: किसान चंद्रशेखर पटेल के अनुभव के अनुसार, 4 एकड़ में खेती की लागत लगभग 30,000 रुपये प्रति एकड़ आती है, जबकि इससे होने वाली आय 1 लाख रुपये प्रति एकड़ से भी अधिक है।
- सस्ता बीज: शासन द्वारा किसानों को प्रोत्साहन देने के लिए मात्र 70 रुपये प्रति किलो की दर से उन्नत बीज उपलब्ध कराया जा रहा है।
राष्ट्रीय पहचान: बेंगलुरु से कारगिल तक मांग
छत्तीसगढ़ का यह सुगंधित चावल अब एक ब्रांड बन चुका है। इसकी मांग चेन्नई, तेलंगाना, लद्दाख और कारगिल जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में तेजी से बढ़ी है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर हो और विपणन (Marketing) सही दिशा में किया जाए, तो स्थानीय उत्पाद भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
लक्ष्य: 700 से 2000 एकड़ का सफर
राज्य सरकार की ‘कृषि उन्नति योजना’ और ‘भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना’ जैसी नीतियों ने किसानों में नया उत्साह भरा है। प्रशासन और कृषि विभाग की सक्रियता का ही परिणाम है कि पिछले वर्ष जहाँ इसकी खेती 700 एकड़ में हो रही थी, उसे इस वर्ष बढ़ाकर 2000 एकड़ करने का लक्ष्य रखा गया है। किसान समूहों और एफपीओ (FPO) के माध्यम से अब इसकी खेती और बिक्री को संगठित रूप दिया जा रहा है।




