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अफ्रीकन स्वाइन फीवर को मात देने की तैयारी, भारत के अम्बिकापुर में पहला वैक्सीन ट्रायल, जानिए घरेलू और जंगली सुवरों मैं कैसे फैलती है यह लाइलाज बीमारी????

भारत के विज्ञान जगत और पशुपालन क्षेत्र के लिए 31 मार्च 2026 की तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के अम्बिकापुर (सकालो) स्थित शासकीय पिग फार्म में अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) की वैक्सीन का देश का पहला ट्रायल शुरू हो चुका है। यह कदम न केवल भारत को आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर इस घातक बीमारी से जूझ रहे पशुपालकों के लिए उम्मीद की एक नई किरण बनकर उभरा है।

इतिहास: एक ऐसी जंग जिसमें अब तक हार ही मिली
अफ्रीकन स्वाइन फीवर का इतिहास विनाशकारी रहा है। यह एक ऐसा संक्रामक वायरल संक्रमण है जिसने दुनिया भर के सूअर पालन उद्योग को अरबों डॉलर का नुकसान पहुँचाया है। अब तक की स्थिति यह थी कि यदि किसी फार्म में एक भी पशु संक्रमित पाया जाता, तो संक्रमण रोकने का एकमात्र तरीका ‘क्यूलिंग’ (पशुओं को मारना) ही था। कोई दवा, कोई इलाज और कोई वैक्सीन उपलब्ध न होने के कारण यह बीमारी किसानों के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं रही है।
वर्तमान: अम्बिकापुर बना भारत का ‘ग्राउंड जीरो’
वर्तमान में, जबकि पूरी दुनिया इस वायरस के लिए एक प्रभावी वैक्सीन की तलाश कर रही है, भारत ने अम्बिकापुर को अपने पहले परीक्षण केंद्र के रूप में चुना है।

  • स्वदेशी तकनीक: इस वैक्सीन को भोपाल स्थित ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज’ (NIHSAD) के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है।
  • वैज्ञानिक नेतृत्व: डॉ. वेंकटेश और डॉ. सेंथिल कुमार जैसे शीर्ष वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में तैयार यह वैक्सीन वैज्ञानिक पद्धति से परखी जा रही है।
  • स्थानीय निगरानी: अम्बिकापुर पिग फार्म के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. सी. के. मिश्रा के अनुसार, यह ट्रायल पूरी तरह से नियंत्रित और उच्च स्तरीय सुरक्षा मानकों के बीच किया जा रहा है।
    विश्लेषण: यह ट्रायल इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
    यह ट्रायल केवल एक “सुई लगाने” की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और आर्थिक विश्लेषण छिपा है:
  • वैश्विक नेतृत्व: अभी तक विश्व स्तर पर कोई पूर्ण स्वीकृत कमर्शियल वैक्सीन नहीं है। यदि यह ट्रायल सफल होता है, तो भारत दुनिया का पहला देश बन सकता है जो इस बीमारी का समाधान प्रदान करेगा।
  • आर्थिक सुरक्षा: सूअर पालन से जुड़े गरीब और मध्यम वर्गीय किसानों के लिए यह ‘जीवन बीमा’ जैसा है। इससे उनकी आजीविका सुरक्षित होगी।
  • वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता: यह ‘मेक इन इंडिया’ और भारतीय पशु चिकित्सा विज्ञान की बढ़ती ताकत का प्रमाण है।
    भविष्य: एक सुरक्षित और समृद्ध पशुपालन का सपना
    आने वाले समय में यदि यह परीक्षण सफल रहता है, तो ‘क्यूलिंग’ और ‘क्वारंटाइन’ जैसे शब्द इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे। भविष्य का भारत पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में न केवल खुद को सुरक्षित करेगा, बल्कि इस तकनीक को दुनिया के अन्य देशों को निर्यात करने की क्षमता भी रखेगा।
    अम्बिकापुर के सकालो फार्म से शुरू हुई यह छोटी सी हलचल आने वाले कल में भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी क्रांति का सूत्रपात करने वाली है। देश की नजरें अब वैज्ञानिकों की उस रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो सूअर पालन उद्योग की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल देगी।
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