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तंत्र की सुस्ती या शिकारियों की चुस्ती? 7 महीने बाद खुली नींद, तब जाकर पकड़ में आई तेंदुए की खाल

छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में वन्यजीव संरक्षण की स्थिति कागजों पर जितनी मजबूत दिखती है, धरातल पर उसकी हकीकत उतनी ही डरावनी है। हाल ही में वन विभाग द्वारा 9 आरोपियों की गिरफ्तारी और 195 सेंटीमीटर लंबी तेंदुए की खाल की बरामदगी ने एक बड़ी सफलता तो दर्ज की है, लेकिन इस मामले के एक पहलू ने पर्यावरण प्रेमियों और विशेषज्ञों को झकझोर कर रख दिया है।

7 महीने का ‘सन्नाटा’: कहाँ थी निगरानी?                         गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में जो खुलासा हुआ, वह चौंकाने वाला है। इस तेंदुए का शिकार आज नहीं, बल्कि 7 महीने पहले अवैध ‘भरमार बंदूक’ से किया गया था। सवाल यह उठता है कि इन 210 दिनों तक वन विभाग का खुफिया तंत्र और बीट गार्ड्स कहाँ थे?

  • गश्त पर सवाल: क्या जंगलों में होने वाली गोलीबारी की आवाजें अधिकारियों के कानों तक नहीं पहुँची?
  • सूचना तंत्र की विफलता: एक वन्यजीव का शिकार होकर उसकी खाल का सूखना, संरक्षित होना और तस्करी के लिए तैयार हो जाना—यह पूरी प्रक्रिया विभाग की नाक के नीचे चलती रही और सिस्टम ‘सब ठीक है’ की नींद सोता रहा।
    वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम: केवल कागजी ढाल?
    वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 (संशोधित 2022) के तहत शिकारियों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान है। लेकिन कानून का डर तभी काम करता है जब पकड़ में आने की संभावना तत्काल हो। 7 महीने की देरी यह बताती है कि शिकारी बेखौफ हैं और उन्हें पता है कि वे लंबे समय तक कानून की नजरों से बच सकते हैं।
    तेंदुआ खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक तेंदुए की कमी का मतलब है पूरे पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) का असंतुलन। यदि एक शिकार को पकड़ने में आधा साल से ज्यादा का समय लगेगा, तो तब तक हमारी जैव-विविधता को अपूरणीय क्षति हो चुकी होगी।
    सरकारी प्रयास: धरातल पर असर या महज औपचारिकता?
    वन मंत्री और आला अधिकारियों के नेतृत्व में हुई यह संयुक्त कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन यह ‘पोस्ट-मॉर्टम’ जैसी स्थिति है। संरक्षण का अर्थ शिकार होने के बाद खाल बरामद करना नहीं, बल्कि शिकार को होने से रोकना है।
    धरातल की चुनौतियां:
  • अवैध हथियारों की भरमार: नारायणपुर और बस्तर जैसे क्षेत्रों में ‘भरमार बंदूकों’ का खुलेआम इस्तेमाल वन विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
  • संसाधनों की कमी या इच्छाशक्ति? आधुनिक तकनीक और ड्रोन सर्विलांस के दौर में भी अगर 7 महीने पुराने शिकार की खबर अब मिल रही है, तो विभाग को अपनी कार्यशैली पर आत्ममंथन करने की जरूरत है।
    जागने का वक्त अब है
    छत्तीसगढ़ की यह घटना एक चेतावनी है। हमें केवल ‘जब्ती’ पर खुश होने के बजाय ‘रोकथाम’ पर ध्यान देना होगा। वन्यजीव संरक्षण केवल बैठकों और विशेष अभियानों का हिस्सा नहीं, बल्कि प्रतिदिन की सजगता का विषय होना चाहिए। अगर तंत्र ऐसे ही सुस्त रहा, तो आने वाली पीढ़ियां इन शानदार जानवरों को केवल तस्वीरों में ही देख पाएंगी।
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