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छत्तीसगढ़ का बेमेतरा जिला इस वर्ष एक गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। कम वर्षा के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट आई है, जिसके चलते जिले की 425 ग्राम पंचायतों ने आगामी रबी सीजन (ग्रीष्मकालीन मौसम) में धान की खेती न करने का एक सर्वसम्मत और साहसिक फैसला लिया है। यह निर्णय जल संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।

सूखे की मार: बेमेतरा में 39% कम वर्षा:- आंकड़ों की बात करें तो, बेमेतरा जिले में इस वर्ष सामान्य वर्षा का केवल 61.5% ही हुआ है, जो पिछले 10 वर्षों के औसत से 39% कम है। सबसे विकट स्थिति बेमेतरा तहसील की रही, जहाँ मात्र 483 मिमी वर्षा दर्ज की गई है। इस सूखे ने भूजल स्रोतों पर अत्यधिक दबाव डाला है, जिससे ट्यूबवेल और हैंडपंप सूखने लगे हैं और पेयजल संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।।                                      🌾 भूजल दोहन पर वैज्ञानिक चेतावनी:-भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (CRRI) ने बार-बार ग्रीष्मकालीन धान की खेती से भूजल पर पड़ने वाले अत्यधिक दबाव को लेकर चेतावनी दी है। धान एक अधिक जल-गहन फसल है, और गर्मी के मौसम में इसकी खेती से भूजल का बड़े पैमाने पर दोहन होता है, जिससे स्थायी पर्यावरणीय और कृषि संकट उत्पन्न होता है। पिछले रबी सीजन में, जिले के कुल 1.73 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में से 26,680 हेक्टेयर में गर्मी के मौसम में धान की खेती हुई थी, जिसने जल संसाधनों को बुरी तरह प्रभावित किया था।                                                                                समाधान: कम पानी वाली फसलों को अपनाना:– इस सामूहिक निर्णय के साथ, बेमेतरा जिले के किसानों को अब फसल विविधीकरण की ओर बढ़ने की सलाह दी जा रही है। कलेक्टर रणवीर शर्मा ने किसानों से अपील की है कि वे जल संरक्षण के लिए इस सामूहिक निर्णय का समर्थन करें। उन्हें धान के बजाय कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें जैसे:

  • दालें: मूंग, उड़द, चना
  • अनाज/तिलहन: मक्का, सरसों
  • अन्य: तिलहन, तरबूज, खरबूजा, आदि उपजाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
    🤝 छत्तीसगढ़ में जनभागीदारी से जल क्रांति
    यह जल संरक्षण की पहल केवल बेमेतरा तक सीमित नहीं है। राजनांदगांव, रायगढ़, धमतरी और बलरामपुर जैसे जिलों में भी प्रशासन ने किसानों को कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों (मक्का, मूंग, उड़द, चना, सरसों) को अपनाने के लिए प्रेरित किया है।
    इन सभी जिलों में प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारी गांव-गांव जाकर किसान संगोष्ठियां आयोजित कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य किसानों को फसल विविधीकरण और जल संरक्षण के लाभ समझाना है। कई स्थानों पर महिलाएँ और युवा समूह “नीर और नारी जल यात्रा” जैसे अभियान चलाकर पानी के महत्व और संरक्षण की जागरूकता फैला रहे हैं।
    इन सामूहिक प्रयासों से स्थायी जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो रही है। “मोर गांव मोर पानी” जैसे जागरूकता अभियान छत्तीसगढ़ प्रदेश में जनभागीदारी के साथ जल संरक्षण कार्यों को गति दे रहे हैं, जहाँ तकनीकी और सामुदायिक प्रयासों से जल स्रोत पुनर्जीवित किए जा रहे हैं। बेमेतरा के 425 पंचायतों का यह ऐतिहासिक फैसला देश के अन्य सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है।
    यह लेख न केवल बेमेतरा के निर्णय को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पूरा छत्तीसगढ़ सामूहिक रूप से जल संकट से निपटने के लिए तैयार है।
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